मानवी

मानवीमैं टूटती हूँ हज़ारों बार फिर जुड़ जाती हूँ बिना आवाज़ ये टूटने और जुड़ने की प्रक्रिया घटती है बार-बार और सुनती हूँ; कि हूँ मैं एक चट्टान । मैं डूबती हूँ गहन अंधेरों में और छटपटाती हूँ बेहिसाब फिर लौट आती हूँ किनारों पर थक-हार; तार-तार और सुनती हूँ; कि हूँ मैं एक परिपक्व [...]