to life in them, people who gave their blood while they
lived, and who will now give their example.
एक बूँद सहसा उछल जाती है, और रुके हुए पानी में गतिमान तरंग बनती हैं.. एक ऐसा ही प्रयास है यह....
Howard Marks once said that “I became famous overnight after writing for 10 years.”
Mr. Raj Shamani shared a valuable insight that sometimes people who are less smart, less prepared, and less talented still succeed and achieve bigger things. He emphasized consistency as a key factor enabling such success despite lacking typical advantages like talent or preparation. I got inspired by that short to write down this blog post. A truly self-aware person recognizes that their greatest strength lies not in constantly accumulating new skills, but in nurturing and deepening the qualities that already define their unique identity. By embracing and building upon what is innately mine, I can offer a piece of life to the readers and viewers.
Hence, I am looking to work behind this YouTube Channel with imperfection and consistency.
I am thrilled to reintroduce the What good is a life if it trails behind work? YouTube channel, a unique space that has been cultivating a rich archive of content for years. This channel is a heartfelt journey through varied worlds—from the magic of world cinema to the nostalgia of IT BHU campus days, the soul-stirring music of folk artists, the dynamics of Farmer Producer Organizations (FPOs), enchanting travelogues, impactful documentaries, and insightful book reviews.
The channel offers the following playlist -
This channel not only preserves memories and knowledge but also seeks to build a community of curious, thoughtful, and informed viewers.
90 के दशक की केबल-टीवी वाली ज़िंदगी आज सोचें तो किसी अलग ही दुनिया जैसी लगती है। एक ही टीवी पर रूसी कार्टून, चीनी धारावाहिक, दूरदर्शन के कार्यक्रम और बीच-बीच में 8-बिट वीडियो गेम की आवाज़ — सब कुछ बिना इंटरनेट के। न वाई-फाई था, न स्मार्टफोन, फिर भी दुनिया हमारे घर तक पहुँच जाती थी… बस एक टेढ़े-मेढ़े टीवी एंटीना के सहारे।
90 के दशक में टीवी देखने का मज़ा ही कुछ और था | पहले तो हम DD National और DD Metro के भक्त हुआ करते थे। रामायण दोबारा देखने में भी गर्व होता था। एंटीना को घुमाकर और केबल का सिग्नल ठीक करने की कोशिश अपने आप में एकगेम जैसी होती थी। और उसी भरोसे में हमारा बचपन दुनिया घूम आता था — बस केबल के सहारे।
दूरदर्शन के बाद प्राइवेट चैनलों के आने का इंतज़ार ही सबसे बड़ी एक्साइटमेंट हुआ करता था। वो दौर जब “केबल कनेक्शन” लगना किसी स्टेटस सिंबल से कम नहीं था। मोहल्ले की किसी छत पर जैसे ही नया केबल एंटीना दिखता, खबर अपने-आप फैल जाती — “अरे, इनके घर तो अब सारे चैनल आने वाले हैं!” शाम होते ही बच्चे वहीं जमा, रिमोट हाथ में लेने की बारी को लेकर बहस, और चैनल बदलने पर बड़ों की डाँट।
किसी घर की छत पर जैसे ही नया को-एक्सियल वायर चमकता दिख जाए, पूरा मोहल्ला गर्व से देखता — “अब तो इनके यहाँ पूरे 50 चैनलों का पैकेज है… दूरदर्शन वाले तो जैसे अगले युग में पहुँच गए!” एंटीना या डिश लगवाना अपने आप में स्टेटस सिंबल था — ठीक वैसे ही जैसे आज 5G फोन रखना। ज़ी और सोनी का ज़माना था, शाम होते ही उन्हीं चैनलों पर घर थम सा जाता था।
हमारे असली हीरो तब केबल ऑपरेटर और टीवी एंटीना लगाने वाले होते थे। और बस, यहीं से टीवी की दुनिया पलट गई। उस ज़माने के केबल ऑपरेटर अपने आप में किसी मिनी गॉडफादर से कम नहीं थे। वही तय करते थे कि आज रात कौन-सी पिक्चर आएगी, कौन-सा चैनल खुलेगा, और किस घर में सबसे ज़्यादा रोमांच पहुँचेगा। हमारे केबल-वाले अंकल को शायद खुद भी नहीं पता होता था कि कौन सा चैनल किस देश का है, लेकिन हमें पूरा भरोसा रहता था - “ये देखो, ये वाला असली विदेशी चैनल है!”
दिन में ज़ी हॉरर शो का खौफ और रात में आहट की आह — ऊपर से कम फ़्रीक्वेंसी वाली स्टैटिक स्क्रीन! क्या ज़बरदस्त कॉम्बिनेशन था! हर शुक्रवार या शनिवार को मोहल्ले के बच्चों के बीच बस एक ही सवाल गूंजता था: “आज ज़ी हॉरर शो में कौन मरेगा?” और “आहट में भूत आएगा या चुड़ैल?”
वो कहानी सुनाना भी किसी नाटक से कम नहीं होता था — कोई भूत की आवाज़ निकालता, कोई अचानक ज़ोर से “आह!” बोल देता, कोई दरवाज़ा खुलने वाला सीन हाथों से समझाता। हर डरावना दृश्य दोबारा जिया जाता था, हर सीन को ज़मीन पर उँगली से खींचकर समझाया जाता था। जो नहीं देख पाए होते, वे सवाल पूछते रहते — “फिर क्या हुआ?” और कहानीकार जानबूझकर रुकता, सस्पेंस बढ़ाता ताकि सब और पास आ जाएँ। घंटी बजने तक डर चलता रहता था, और कभी-कभी वो डर घर तक भी साथ चला जाता था। और वही बच्चे आगे चलकर मोहल्ले के सबसे बड़े कहानीकार बन गए।
वो सिर्फ़ टीवी सीरियल नहीं थे — वो हमारी साझा कल्पनाएँ थीं, जो खेल के मैदान, क्लासरूम और मोहल्ले की गलियों में बार-बार ज़िंदा हो जाती थीं। 90s का डर बीत गया, लेकिन उन कहानियों ने हमें हमेशा के लिए कहानी सुनना और कहना सिखा दिया।
सुबह आते ही माहौल फिर बदल जाता — सोनी या स्टार वर्ल्ड पर डेन्निस द मेनस, आई लव जीनी, और स्माल वंडर जैसी विदेशी सिटकॉम्स चलने लगतीं। हमें कुछ समझ नहीं आता था, लेकिन हम वैसे ही हँसते जैसे असली अंग्रेज़। माँ पीछे से पुकारती - “इतना टीवी मत देखो, आँखें खराब हो जाएँगी!” और हम सोचते - “माँ को क्या पता, ये तो इंटरनेशनल एजुकेशन चल रही है!”
यही तो सांस्कृतिक वैश्वीकरण का पहला संस्करण था! इसी के साथ, बैकग्राउंड में चल रहे थे हमारे पैरेलल यूनीवर्स — मोहल्ले की गलियों में अपनी कहानियाँ, स्कूल के प्लेग्राउंड में दोस्ती और शरारतें, और टीवी के सामने डरावने और मज़ेदार पल — सब एक साथ, एक अलग ही यूनिवर्स में।
फिर अचानक एक दिन केबल पर चीनी धारावाहिक भी आने लगे - “द हीरोज़ ऑफ़ द कॉन्डर”, “मंकी किंग”, और वे कुंग-फू वाले दृश्य, जिनसे पूरा मोहल्ला मंत्रमुग्ध हो जाता था। ब्रेक में हम दोस्तों से पूछते - “तेरा फ़ेवरेट कौन है - यांग गुओ या वो उड़ने वाली लड़की?” और शाम होते ही गलियों में उसी अंदाज़ में कूद-फाँद करते हुए अपनी तलवारबाज़ी की प्रैक्टिस शुरू हो जाती थी।
जैसे-जैसे हम किशोरावस्था की ओर बढ़ते, हमारे अनुभव भी बदलने लगे। अब वही लेट-नाइट शोज़ सिर्फ़ डर या मज़े तक सीमित नहीं रह गए, बल्कि धीरे-धीरे जिज्ञासा, शरारत और नई दुनिया को समझने की कोशिश में बदल गए। कुछ घरों में “ब्लू स्क्रीन” का मतलब सचमुच नीली स्क्रीन नहीं होता था — वो ऐसे चैनल होते थे जिन्हें केबल वाले अंकल “सिर्फ़ रात 11 बजे के बाद” बताते थे, और हम उन्हें चोरी-छिपे देखने की पूरी रणनीति बना लेते थे।
उन दिनों अगर रात में REN TV (РЕН ТВ) या TV-6 (ТВ-6) पर कोई रूसी सीरियल या प्रोग्राम चल रहा हो, तो दिल की धड़कन अपने-आप तेज़ हो जाती थी। केबल टीवी, रूसी चैनल और हमारी किशोरावस्था की दुनिया — सब कुछ थोड़ा-सा समझ से बाहर, लेकिन रोमांच से भरपूर। कभी-कभी लेट-नाइट शोज़ के नाम पर धीमी आवाज़ में कोई वीडियो चल रहा होता था — और वही हमारे लिए पूरी रोमांचक एक्साइटमेंट बन जाती थी। वो थे केबल टीवी के अश्लील पल — जिन्हें याद करते ही आज भी चेहरे पर हल्की-सी शरारती मुस्कान आ जाती है।
आज सब कुछ ऑन-डिमांड है, लेकिन उस इंतज़ार, उस जुगाड़ और साथ बैठकर टीवी देखने के मज़े का कोई मुकाबला नहीं था। 90 के दशक की दुनिया सुविधाओं में भले ही सीमित थी, लेकिन यादों में बेहद समृद्ध — बिल्कुल असली, बिल्कुल अपना।
आज जब OTT, Netflix और एआई-निर्देशित सिफ़ारिशों की बाढ़ है, तब लगता है कि हमारे बचपन का ‘रैंडम केबल टीवी चैनल सर्फ़िंग’ ही असली एल्गोरिद्म था — बिल्कुल अप्रत्याशित, रोमांचक, और किसी भी सब्सक्रिप्शन से कहीं ज़्यादा मज़ेदार। वो पल, वो डर, वो हँसी — यही थे हमारे 90 के दशक के छोटे-छोटे जादुई पल, जो आज भी यादों में पूरी तरह जीवित हैं।
"The Seen and the Unseen" is India's premier long-form podcast hosted by Amit Varma. The podcast, which has been running since 2017, features long-form conversations with intellectuals, writers, economists, historians, and thought leaders from India and around the world.
Amit Varma is a respected journalist and writer, twice winner of the Bastiat Prize for Journalism. The show is known for its rich intellectual content and the diversity of its guests, making it a valuable resource for anyone interested in public policy, history, culture, or economics in India today. I am only sharing the books recommended related to Literature & Fiction (International):
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