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दिल की ख़्वाहिश ये कैसी

दिल की ख़्वाहिश ये कैसी जो बढ़ रही आहिस्ता है . हर रोज़ पाने की आरज़ू कुछ ऐसी बिखरने का तुझमे मन सा है . वक्त की सिल्वटो मे गुज़रे अरमाँ ये कैसे अनजान कोई बंधन सा है . सँवरती यूँ तो हर रंग मे मै पर जो खिलता मुझपे हर पल यूँही कुछ प्रेम का रंग सा है || ~स्मृति

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देखा तुझे

तुम देखो ढलते सूरज को

अब यूँ तो ख़्वाबों सा लगता है

कुछ बात रही कुछ कह दी तुझसे

कुछ वक्त निकाल आजकल ||

मै बेलाज़मी सवाल सी ||

एक ख़्वाबों सा जहाँ ||

मेरे नज़्म अनजान ||