दिल की ख़्वाहिश ये कैसी
दिल की ख़्वाहिश ये कैसी जो बढ़ रही आहिस्ता है . हर रोज़ पाने की आरज़ू कुछ ऐसी बिखरने का तुझमे मन सा है . वक्त की सिल्वटो मे गुज़रे अरमाँ ये कैसे अनजान कोई बंधन सा है . सँवरती यूँ तो हर रंग मे मै पर जो खिलता मुझपे हर पल यूँही कुछ प्रेम का रंग सा है || ~स्मृति







