खाड़ी के देशों में वातावरण तंग होने लगा था। ईरान और इज़राइल की आपसी लड़ाई खाड़ी देशों पर कहर बनकर टूट पड़ी थी।
रवि सऊदी अरब के खोबर शहर में रहता था। उसके शहर में तनाव कुछ कम था लेकिन पड़ोसी देश बहरीन के हालात बहुत ख़राब थे। इसलिए रवि ने बहरीन में रहने वाले अपने दोस्तों और सहकर्मियों को सहपरिवार अपने घर बुला लिया था। जैसे ही भारत लौटने के लिए टिकट मिलती, वह सबको सुरक्षित वापस भेजने की कोशिश करता।
पिछले पंद्रह दिनों से यह सिलसिला चल रहा था। रवि को पत्नी पूजा का पूरा सहयोग मिला। बच्चों को शुरू-शुरू में मेहमानों से भरा घर अच्छा लगा, पर जब एक-दो बच्चों ने उनके खिलौने तोड़ दिए, तो उन्होंने विरोध जताना शुरू कर दिया। मम्मी-पापा उनकी चीज़ें बाँट रहे थे—यह बात उन्हें चुभ रही थी।
पूजा ने उस समय जैसे-तैसे बच्चों को समझाकर स्थिति संभाल ली, पर रवि के मन में एक हल्की चिंता घर कर गई थी।
एक तरफ़ युद्ध का माहौल और दूसरी ओर टीवी पर उसका बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाना—इन सबके बीच भारत में बैठे माता-पिता की चिंता बढ़ती जा रही थी। अंततः रवि ने ईद की छुट्टियों में भारत जाने का निर्णय लिया।
उसे लगा— अब समय है बच्चों को उन जड़ों से मिलाने का, जहाँ से रिश्तों की असली समझ जन्म लेती है।
तीन साल बाद, रवि अपने बच्चों के साथ उसी पुराने मोहल्ले की गलियों में चल रहा था।
वही कच्ची सड़कें, वही पेड़ों की छाँव, वही घरों की खिड़कियाँ… पर अब उसके साथ उसकी अगली पीढ़ी थी।
हर मोड़, हर घर उसकी ज़िंदगी के रंग समेटे खड़ा था।
चलते-चलते वह एक पुराने घर के सामने रुका और बोला,
“यहीं मैं बड़ा हुआ हूँ…”
बच्चे उत्सुकता से इधर-उधर देखने लगे।
रवि ने धीरे-धीरे अपनी कहानी खोलनी शुरू की—
“जब मैं छोटा था, तब आपके दादाजी की तबीयत बहुत खराब हो गई थी। घर में मुश्किलें थीं… लेकिन तुम्हारे ताऊजी—अंकित.. उन्होंने कभी हमें अकेला महसूस नहीं होने दिया। अपनी पढ़ाई, अपने सपने… सब पीछे रखकर उन्होंने घर संभाला।”
बच्चों की आँखों में एक नया भाव उतरने लगा।
आगे बढ़ते हुए रवि ने सामने वाले घर की ओर इशारा किया—
“यहाँ देसाई अंकल-आंटी रहते थे। पूरे मोहल्ले के लिए जैसे परिवार थे। किसी के घर में परेशानी हो, तो सबसे पहले वही पहुँचते थे। उन्होंने हमें सिखाया कि, रिश्ते सिर्फ़ खून से नहीं, दिल से बनते हैं।”
थोड़ा आगे बढ़कर वह मुस्कुराया—
“और यहाँ… मैं और मेरा दोस्त निलेश घंटों खेला करते थे। ज़िंदगी में जब भी मैं टूटा, मेरा दोस्त बिना कुछ कहे मेरे साथ खड़ा रहा।”
पूजा ने देखा—बच्चे अब सवाल नहीं पूछ रहे थे, बस सुन रहे थे… और महसूस कर रहे थे।
शाम ढलने लगी थी। आसमान में हल्की सुनहरी आभा फैल रही थी। तभी गली के एक कोने में हलचल दिखी।
एक बुज़ुर्ग व्यक्ति सड़क किनारे बैठे थे—थके, उलझे हुए, जैसे रास्ता भटक गए हों। आसपास कुछ लोग देख तो रहे थे, पर कोई आगे नहीं बढ़ रहा था।
रवि कुछ सोच पाता, उससे पहले उसका छोटा बेटा आरव आगे बढ़ा।
उसने धीरे से बुज़ुर्ग का हाथ थामा—
“दादाजी… आप ठीक हैं? आपको घर जाना है क्या?”
रवि और पूजा एक पल के लिए ठिठक गए।
आरव ने अपने बैग से पानी की बोतल निकाली और उन्हें दी।
उसकी बहन ने बिना कहे मम्मी-पूजा को बुलाया।
कुछ ही देर में रवि भी पास आ गया। उसने प्यार से पूछा,
“कहाँ जाना है आपको?”
बुज़ुर्ग ने काँपती आवाज़ में अपना पता बताया।
अब तक आसपास के लोग भी जुड़ने लगे थे। किसी ने फोन मिलाया, किसी ने कुर्सी ला दी।
धीरे-धीरे वह गली, जो अभी तक सिर्फ़ एक रास्ता थी, एक परिवार में बदलने लगी।
रवि ने अपने बच्चों की ओर देखा—
उनके चेहरों पर अब शिकायत नहीं थी,
बल्कि एक सुकून था… जैसे उन्होंने कुछ समझ लिया हो।
घर लौटते समय आरव ने धीरे से पूछा,
“पापा… क्या हम भी ऐसे ही किसी के काम आ सकते हैं?”
रवि की आँखें नम हो गईं।
उसने बस इतना कहा—
“यही तो रिश्तों का असली रंग है, बेटा…”
उस रात, बच्चों ने अपने खिलौने खुद ही अलग रख दिए—
“ये हम वापस जाकर सबके साथ बाँटेंगे…”
पूजा ने चुपचाप रवि की ओर देखा।
दोनों की आँखों में एक ही संतोष था—
बिना उपदेश के, बिना ज़ोर दिए, बच्चों ने वह सीख ली थी, जो शब्दों से नहीं सिखाई जा सकती।
गली की हल्की हवा, पेड़ों की छाँव, और बीते हुए रिश्तों की खुशबू—सब मिलकर जैसे एक अनकही कहानी कह रहे थे।
आज फिर से रवि-पूजा ने महसूस किया कि,
ज़िंदगी का सबसे सुंदर रंग
न किसी जीत में है,
न किसी दौलत में…
वह तो बस,
निःस्वार्थ, सच्चे और जीवनभर निभने वाले रिश्तों में बसता है।
और
उस रंग की हल्की सी छाप
उसके बच्चों के दिलों में भी उतर रही थी।
✍🏻 आरती परीख २३.३.२०२६






