रिश्तों के रंग

खाड़ी के देशों में वातावरण तंग होने लगा था। ईरान और इज़राइल की आपसी लड़ाई खाड़ी देशों पर कहर बनकर टूट पड़ी थी।

रवि सऊदी अरब के खोबर शहर में रहता था। उसके शहर में तनाव कुछ कम था लेकिन पड़ोसी देश बहरीन के हालात बहुत ख़राब थे। इसलिए रवि ने बहरीन में रहने वाले अपने दोस्तों और सहकर्मियों को सहपरिवार अपने घर बुला लिया था। जैसे ही भारत लौटने के लिए टिकट मिलती, वह सबको सुरक्षित वापस भेजने की कोशिश करता।

पिछले पंद्रह दिनों से यह सिलसिला चल रहा था। रवि को पत्नी पूजा का पूरा सहयोग मिला। बच्चों को शुरू-शुरू में मेहमानों से भरा घर अच्छा लगा, पर जब एक-दो बच्चों ने उनके खिलौने तोड़ दिए, तो उन्होंने विरोध जताना शुरू कर दिया। मम्मी-पापा उनकी चीज़ें बाँट रहे थे—यह बात उन्हें चुभ रही थी।

पूजा ने उस समय जैसे-तैसे बच्चों को समझाकर स्थिति संभाल ली, पर रवि के मन में एक हल्की चिंता घर कर गई थी।

एक तरफ़ युद्ध का माहौल और दूसरी ओर टीवी पर उसका बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाना—इन सबके बीच भारत में बैठे माता-पिता की चिंता बढ़ती जा रही थी। अंततः रवि ने ईद की छुट्टियों में भारत जाने का निर्णय लिया।

उसे लगा— अब समय है बच्चों को उन जड़ों से मिलाने का, जहाँ से रिश्तों की असली समझ जन्म लेती है।

तीन साल बाद, रवि अपने बच्चों के साथ उसी पुराने मोहल्ले की गलियों में चल रहा था।

वही कच्ची सड़कें, वही पेड़ों की छाँव, वही घरों की खिड़कियाँ… पर अब उसके साथ उसकी अगली पीढ़ी थी।

हर मोड़, हर घर उसकी ज़िंदगी के रंग समेटे खड़ा था।

चलते-चलते वह एक पुराने घर के सामने रुका और बोला,
“यहीं मैं बड़ा हुआ हूँ…”

बच्चे उत्सुकता से इधर-उधर देखने लगे।

रवि ने धीरे-धीरे अपनी कहानी खोलनी शुरू की—
“जब मैं छोटा था, तब आपके दादाजी की तबीयत बहुत खराब हो गई थी। घर में मुश्किलें थीं… लेकिन तुम्हारे ताऊजी—अंकित.. उन्होंने कभी हमें अकेला महसूस नहीं होने दिया। अपनी पढ़ाई, अपने सपने… सब पीछे रखकर उन्होंने घर संभाला।”

बच्चों की आँखों में एक नया भाव उतरने लगा।

आगे बढ़ते हुए रवि ने सामने वाले घर की ओर इशारा किया—
“यहाँ देसाई अंकल-आंटी रहते थे। पूरे मोहल्ले के लिए जैसे परिवार थे। किसी के घर में परेशानी हो, तो सबसे पहले वही पहुँचते थे। उन्होंने हमें सिखाया कि, रिश्ते सिर्फ़ खून से नहीं, दिल से बनते हैं।

थोड़ा आगे बढ़कर वह मुस्कुराया—
“और यहाँ… मैं और मेरा दोस्त निलेश घंटों खेला करते थे। ज़िंदगी में जब भी मैं टूटा, मेरा दोस्त बिना कुछ कहे मेरे साथ खड़ा रहा।

पूजा ने देखा—बच्चे अब सवाल नहीं पूछ रहे थे, बस सुन रहे थे… और महसूस कर रहे थे।

शाम ढलने लगी थी। आसमान में हल्की सुनहरी आभा फैल रही थी। तभी गली के एक कोने में हलचल दिखी।

एक बुज़ुर्ग व्यक्ति सड़क किनारे बैठे थे—थके, उलझे हुए, जैसे रास्ता भटक गए हों। आसपास कुछ लोग देख तो रहे थे, पर कोई आगे नहीं बढ़ रहा था।

रवि कुछ सोच पाता, उससे पहले उसका छोटा बेटा आरव आगे बढ़ा।
उसने धीरे से बुज़ुर्ग का हाथ थामा—
“दादाजी… आप ठीक हैं? आपको घर जाना है क्या?”

रवि और पूजा एक पल के लिए ठिठक गए।

आरव ने अपने बैग से पानी की बोतल निकाली और उन्हें दी।
उसकी बहन ने बिना कहे मम्मी-पूजा को बुलाया।

कुछ ही देर में रवि भी पास आ गया। उसने प्यार से पूछा,
“कहाँ जाना है आपको?”

बुज़ुर्ग ने काँपती आवाज़ में अपना पता बताया।

अब तक आसपास के लोग भी जुड़ने लगे थे। किसी ने फोन मिलाया, किसी ने कुर्सी ला दी।

धीरे-धीरे वह गली, जो अभी तक सिर्फ़ एक रास्ता थी, एक परिवार में बदलने लगी।

रवि ने अपने बच्चों की ओर देखा—
उनके चेहरों पर अब शिकायत नहीं थी,
बल्कि एक सुकून था… जैसे उन्होंने कुछ समझ लिया हो।

घर लौटते समय आरव ने धीरे से पूछा,
“पापा… क्या हम भी ऐसे ही किसी के काम आ सकते हैं?”

रवि की आँखें नम हो गईं।
उसने बस इतना कहा—
“यही तो रिश्तों का असली रंग है, बेटा…”

उस रात, बच्चों ने अपने खिलौने खुद ही अलग रख दिए—
“ये हम वापस जाकर सबके साथ बाँटेंगे…”

पूजा ने चुपचाप रवि की ओर देखा।
दोनों की आँखों में एक ही संतोष था—
बिना उपदेश के, बिना ज़ोर दिए, बच्चों ने वह सीख ली थी, जो शब्दों से नहीं सिखाई जा सकती।

गली की हल्की हवा, पेड़ों की छाँव, और बीते हुए रिश्तों की खुशबू—सब मिलकर जैसे एक अनकही कहानी कह रहे थे।

आज फिर से रवि-पूजा ने महसूस किया कि,
ज़िंदगी का सबसे सुंदर रंग
किसी जीत में है,
किसी दौलत में
वह तो बस,
निःस्वार्थ, सच्चे और जीवनभर निभने वाले रिश्तों में बसता है।

और
उस रंग की हल्की सी छाप
उसके बच्चों के दिलों में भी उतर रही थी।

✍🏻 आरती परीख २३.३.२०२६

दावत खुशियों की..

आज “अंतरराष्ट्रीय ख़ुशी दिवस” पर एक कविता..

आओ आज कुछ अलग सजाएँ,
दिल के आँगन दीप जलाएँ,
रंजिश की हर धूल हटाकर
हँसी की चादर फिर बिछाएँ।

थाली में ना केवल पकवान हों,
कुछ मीठे लम्हों के अरमान हों,
रोटी के संग मीठें रिश्ते परोसें
हर निवाले में अपनेपन के गान हों।

निमंत्रण भेजा है हवाओं के संग,
द्वार सजा है अपनापन के रंग,
जो रूठे हैं; उन्हें भी बुलावा भेजा है
आज ना कोई रहे तन्हा या दंग।

चाहूँ खुशियों की दावत ऐसी,
जहाँ दिल से दिल का मेल हो,
न कोई छोटा, न कोई बड़ा हो
नफरत का ना कोई खेल हो।

थोड़ी सी यादें, थोड़ी सी हँसी,
आँखें बचपन की शरारतों से भरी,
यही तो जीवन का सच्चा स्वाद है
हर एहसास में घुला मधुर आस्वाद है।

चलो आज फिर से जी लें हम,
बीते पलों को सी लें हम,
दावत खुशियों की यूँ सजाएँ
हर दिन को त्यौहार कर दें हम।

✍🏻 आरती परीख २०.३.२०२६

बारिश में खेलती रोशनियाँ

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कहानी : “बारिश में खेलती रोशनियाँ

आसमान उस दिन जैसे अपने सारे बोझ उतार देना चाहता था। बादल बरस नहीं रहे थे, ग़रज़ रहे थे। और गली की मिट्टी की खुशबू में भी एक अजीब-सी टीस घुली हुई थी।

वह बस्ती शहर के पूर्वी किनारे थी। टूटे छप्परों, भीगे कपड़ों और अधूरी ज़रूरतों की बस्ती। पर उस दिन… उसी बस्ती की गलियों में कुछ ऐसा खिल रहा था, जो किसी अमीर शहर में भी दुर्लभ था।

बारिश की तेज़ धारों के बीच, कुछ बच्चे दौड़ रहे थे.. नंगे पाँव, भीगे कपड़े, पर चेहरे पर सूरज-सी चमक लिए। किसी के हाथ में फटा हुआ छाता था, कोई बाल्टी को नाव बना कर बहा रहा था,
तो कोई बस हाथ फैलाकर बूंदों को पकड़ने की कोशिश कर रहा था_जैसे बारिश नहीं, खुशियाँ बरस रही हों।

“अरे सावन! इधर आ, देख; मेरी नाव सबसे तेज़ जा रही है!”
छोटा-सा रघु चिल्लाया।

सावन, जो नाम के जैसा ही मौसम-सा था, हँसते हुए दौड़ा और पानी में छपाक से कूद पड़ा। पानी उछला और उसके साथ हँसी भी!

पास ही खड़ी राधा ने अपना छोटा-सा छाता आगे बढ़ाया,
“चल, इसमें आ जा… भीग जाएगा!”

सावन ने हँसकर कहा,
“भीगने से डरते तो बारिश में आते ही क्यों?!”

और फिर दोनों बच्चे खिलखिलाकर हँस पड़े।

वहीं किनारे, एक बूढ़ी दादीमाँ खड़ी सब देख रही थीं। उनकी आँखों में बारिश की बूंदें नहीं, यादों की चमक थी। वो धीरे से बुदबुदाईं,
गरीबी ने हमसे बहुत कुछ छीना है पर हमारी मुस्कान नहीं छीन पाई।

उसी समय, एक प्यारी सी बच्ची जिसे बस्ती में सब गुड़ियारानी कहते थे वो हाथ में छोटा-सा बर्तन लिए इधर-उधर घूम रही थी। दरअसल वो बारिश का पानी इकट्ठा करने की कोशिश कर रही थी।

राधा ने पूछा, “ओ, गुड़ियारानी.. ये क्या कर रही है तू?”

गुड़िया ने मासूमियत से जवाब दिया,
“माँ ने कहा हैं, ये पानी साफ़ होता है… आज बारिश तेज़ है तो नल में पानी नहीं आयेगा। आज इसी बारिश के पानी से खाना बनेगा।”

क्षण भर के लिए सब चुप हो गए।

उसी वक़्त सावन ने अचानक पानी उछालते हुए कहा,
“तो फिर.. आज का खाना सबसे स्वादिष्ट होगा, क्योंकि इसमें हमारी हँसी भी मिली है!”

और उसी के साथ… बारिश में भीग रहे; खेल रहे बच्चों में हँसी का एक और फव्वारा फूट गया।

बारिश अब भी उतनी ही तेज़ थी, पर आज उस ग़रीब बस्ती में.. उस टूटीफूटी गली में दूर दूर तक कोई उदासी नहीं थी। वहाँ जीवन था, जज़्बा था, अपनापन था।

उन बच्चों के पास शायद खिलौने नहीं थे, पर कल्पना थी। छतें टूटी थीं, पर सपनों का आसमान पूरा था।

दादीमाँ ने आसमान की ओर देखा और धीरे से कहा,
हे भगवान, तूने हमें कम दिया होगा, पर जीना सिखाया है भरपूर।

बारिश धीरे-धीरे थमने लगी। मानो बादल भी मुस्कुराते हुए विदा ले रहे थे। गली में पानी जमा था, पर उसी पानी में बच्चों के कदमों के निशान थे, जो बता रहे थे कि,

खुशी किसी हालात की मोहताज नहीं होती,
वो बस दिल के भीतर उगती है और
फिर हर मौसम को सावन बना देती है।


✍🏻 आरती परीख १८.३.२०२६

“सुर का भी चित्र हो..”

सुर का भी चित्र हो,
मन की भीत पर,
खामोशी के रंग घुलें
हर एक गीत पर…

कभी तो साज़ की खामोशी
रंगों में ढल जाया करे,
कभी तो गूँजती धुन कोई
आँखों में बस जाया करे,
सन्नाटे के आँचल में भी
सपनों की रेखा उभरे..

सुर का भी चित्र हो
मन की भीत पर..

बांसुरी की छवि तो अक्सर
चित्रों में मुस्काती है,
पर उसकी मीठी साँसों की
धुन कहाँ दिख पाती है,
हर अनसुनी सी तान कभी
रंगों में रूप धर ले..

सुर का भी चित्र हो
मन की भीत पर..

कोई रंग हवा में घोले,
कोई स्वर आकार बने,
कभी अधूरी तान भी
इंद्रधनुष सा प्यार बने।
धड़कन की लय उतर आए
इन सूने कागज़ पर..

सुर का भी चित्र हो
मन की भीत पर..

जब मन की कूची चलती है
अंतर का आकाश लिए,
हर कंपन, हर मधुर लय
जी उठती विश्वास लिए,
रागों की महक बिखर जाए
जीवन के हर घर पर..

सुर का भी चित्र हो
मन की भीत पर..

कभी तो राग की धड़कन
कागज़ पर उतरनी चाहिए,
कभी तो सुर की खुशबू भी
रंगों में बिखरनी चाहिए,
बांसुरी तो कई बार आई
अब सुर का चेहरा उभरे..

हाँ.. आ..
सुर का भी चित्र हो,
मन की भीत पर,
खामोशी के रंग घुलें
हर एक गीत पर…
हाँ.. आ..
सुर का भी चित्र हो,
मन की भीत पर,
हर एक गीत पर…

✍🏻 आरती परीख १७.३.२०२६

“अब कहाँ जाओगी?”

तेरे ख़्यालों की धूप
अब भी मेरी छाया पहचानती है,
तेरे कदमों की ख़ामोशी
मेरे दिल की धड़कनों से बात करती है।

तेरी जाती हुई राह ने
जो प्रश्न मेरी पलकों पर रखे हैं,
मैं उसे अपने सफ़र का दिया बना लूँगी।

मैं उन पन्नों में लौट जाऊँगी
जो तेरे नाम से भीगे थे कभी,
जहाँ हर लफ़्ज़ ने
तेरी ख़ामोश मुस्कान को
स्याही की तरह ओढ़ रखा था।

जो गुमनाम पन्ने बिखर गए हैं मुझसे,
मैं उन्हें फिर से समेटूँगी,
क्योंकि हर अधूरी पंक्ति में
तेरी आहट की कोई लौ छुपी है।

सिसकती स्याही से कह देना—
अब मैं भागूँगी नहीं,
अब मैं शब्दों की पनाह में
तेरी यादों का घर बसाऊँगी।

तन्हाई जो मेरी मेज़बान बनी बैठी है,
मैं उसे भी एक गीत के ज़रिए बता दूँगी—
कि कशमकश की इस लंबी राह पर
मैंने हार नहीं मानी,
मैं बस थोड़ी ठहर गई थी।

रूहानी रातें जब बरसात बनेंगी,
मैं भीगती हुई इतना ही कहूँगी—

मैं उसी दिल में जाऊँगी
जहाँ से ये सवाल उठा था,
जहाँ तेरी यादों की रोशनी
अब भी मेरा रास्ता बनती है।

और अगर कोई फिर पूछे—
“अब कहाँ जाओगी?”
तो मैं मुस्कुरा कर कह दूँगी—

“मैं कहीं नहीं जाऊँगी,
मैं तो बस
तेरी अधूरी कहानी में
एक मुकम्मल सवेरा लिखने जा रही हूँ।”

✍🏻 आरती परीख १६.३.२०२६

बिमल के जीवन की नई सुबह

आज विश्व नींद दिवस पर पंचकोश आधारित एक कहानी
~~

कहानी : बिमल के जीवन की नई सुबह

शहर की भाग-दौड़ में रहने वाला बिमल हमेशा थका-थका रहता था। काम बहुत अच्छा था, कमाई भी तगड़ी और घर भी बड़ा और सुंदर बनाया था, पर मन में एक अजीब-सी बेचैनी बनी रहती।

रात देर तक लैपटॉप और मोबाइल पर काम, काम की चिंता और अधूरी नींद, यही बिमल की रोज़मर्रा की दिनचर्या बन गई थी।

धीरे-धीरे उसका शरीर भी जवाब देने लगा। सुबह सिर भारी रहता, काम करते समय मन तनावग्रस्त रहता। कभी मीटिंग में तो कभी ड्राइविंग करते समय रेड-सिग्नल पर अचानक नींद की झपकी आ जाती। छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन भी बढ़ने लगा था।

एक दिन बिमल अपनी इस तंग जीवनशैली से परेशान होकर छोटा-सा वेकेशन लेकर अपने दादाजी के पास गाँव पहुँच गया।

बिमल के दादाजी योग और वेदांत के ज्ञाता थे और निसर्गोपचार के भी बड़े हिमायती थे।
उन्होंने बिमल को देखा और मुस्कराकर पूछा—
“बेटा, आख़िरी बार चैन की नींद कब सोए थे?”

बिमल हँस पड़ा और बोला—
“दादाजी, नींद भी आजकल किसी विलासिता जैसी हो गई है।”

दादाजी ने उसे पास बिठाया और धीरे से कहा—
“यही तुम्हारी थकान का कारण है।”

फिर उन्होंने प्रेम से कहा—
“भागती दुनिया में ठहरना सीखो,
रात की गोद में सोना सीखो।
पंचकोश जब हों संतुलित सारे,
तभी जीवन के दीप उजियारे।”

फिर समझाते हुए बोले—
“बेटा, मनुष्य केवल शरीर नहीं है।हमारे भीतर पाँच परतें होती हैं, जिन्हें पंचकोश कहा जाता है। और अच्छी नींद इन पाँचों को संतुलित करती है।”

बिमल उत्सुक हो गया—
“कैसे, दादाजी?”

दादाजी ने मुस्कराकर समझाना शुरू किया।

१. अन्नमय कोश — शरीर की शांति

“जब तुम गहरी नींद लेते हो,” दादाजी बोले,
“तब शरीर को सच्चा विश्राम मिलता है।
मांसपेशियाँ ढीली पड़ती हैं और कोशिकाएँ स्वयं को सुधारती हैं।
यही अन्नमय कोश का पोषण है।”

२. प्राणमय कोश — ऊर्जा का संतुलन

“नींद के समय श्वास की गति शांत हो जाती है।
प्राण ऊर्जा संतुलित होकर पूरे शरीर में फैलती है।
इसी कारण सुबह शरीर हल्का और ताज़ा महसूस होता है।”

३. मनोमय कोश — भावनाओं की सफाई

दादाजी बोले—
“दिन भर के तनाव, चिंता और दुख मन में जमा हो जाते हैं।
अच्छी नींद उन्हें धो देती है।
इसलिए सुबह मन हल्का और प्रसन्न हो जाता है।”

४. विज्ञानमय कोश — बुद्धि की स्पष्टता

“जब नींद पूरी होती है, तो बुद्धि तेज़ हो जाती है।
विचार स्पष्ट होते हैं और निर्णय सही होते हैं।
यही विज्ञानमय कोश की शक्ति है।”

५. आनंदमय कोश — गहरी शांति

दादाजी ने मुस्कराकर कहा—
“और जब नींद बहुत गहरी होती है, तब मनुष्य थोड़ी देर के लिए परम शांति का अनुभव करता है।
वही आनंदमय कोश की झलक है।”

बिमल चुपचाप सुनता रहा। उसे याद आया कि बचपन में दादाजी यही बातें उसे कहानियों के माध्यम से सुनाया करते थे। लेकिन जीवन की भागदौड़ और व्यावसायिक व्यस्तताओं में वह सब कहीं पीछे छूट गया था।

आज दादाजी की बातों से उसे साफ़ समझ आ गया कि, नींद केवल थकान मिटाने के लिए नहीं, बल्कि पूरे अस्तित्व को संतुलित करने के लिए आवश्यक है।

उस रात उसने पहली बार लैपटॉप बंद कर दिया, मोबाइल दूर रख दिया, कुछ गहरी साँसें लीं और समय पर सो गया।

सुबह जब उसकी आँख खुली, तो सूर्योदय हो चुका था। सूरज की नर्म रोशनी खिड़की से भीतर आ रही थी। बिमल का मन एकदम शांत और प्रफुल्लित था। शरीर हल्का लग रहा था और चेहरे पर अनजानी-सी मुस्कान थी।

तभी बाहर से दादाजी की आवाज़ आई—
“कैसी रही नींद?”

बिमल मुस्कराकर बोला—
“दादाजी, आज समझ आया— अच्छी नींद सच में स्वास्थ्य का सबसे सरल और सबसे गहरा योग है।”

दादाजी ने स्नेह से कहा—
“याद रखना बेटा,
भोजन शरीर को जीवित रखता है, पर नींद जीवन को संतुलित रखती है। जो नींद का सम्मान करता है, वही पंचकोश को संतुलित कर सच्चे स्वास्थ्य का आनंद पाता है।”

उस दिन से बिमल ने अपने जीवन में एक नया नियम जोड़ लिया—

“काम से पहले स्वास्थ्य, और स्वास्थ्य के लिए पूरी नींद।”

अब बिमल अपने दोस्तों और ऑफिस के साथी कर्मचारियों को भी पंचकोश का महत्व समझाने लगा।

और वह अक्सर मुस्कराकर कहता—

“नींद है जीवन की मीठी छाँव,
थकन मिटाए हर इक घाव।
शरीर, मन और बुद्धि का साज,
नींद से खिलता जीवन-राज।

पाँच कोश जब हों संतुलित,
जीवन हो जाए आनंदमय।
सुख-शांति की यही है राह—
अच्छी नींद रखे तन-मन अभिनव।”

✍🏻 आरती परीख १३.३.२०२६

कहानी : “पगडंडी का इंतज़ार”

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कहानी : “पगडंडी का इंतज़ार

सवेरे की हल्की सुनहरी धूप अभी पूरी तरह धरती पर उतरी भी नहीं थी। आकाश में सूरज ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने केसर घोलकर आसमान पर फैला दी हो। तालाब का पानी उस रोशनी को चुपचाप अपने भीतर समेटे बैठा था। उसके किनारे से गुजरती वह पतली-सी पगडंडी जैसे वर्षों से किसी कहानी की साक्षी हो।

उस पगडंडी पर आज भी दो परछाइयाँ चली आ रही थीं।

एक थी ‘गौरी’, जो हर सुबह इस रास्ते से मंदिर तक जाती थी। उसके हाथ में फूलों की छोटी-सी टोकरी होती और कदमों में एक शांत लय। दूसरी तरफ से अक्सर ‘मोहन’ आता; कभी खेतों से, कभी नदी के घाट से।

दोनों एक-दूसरे को चहरे से जानते थे, पर शायद उतना नहीं जितना इस पगडंडी ने उन्हें जाना था।

आज की सुबह कुछ अलग थी। हल्की धुंध तालाब के ऊपर तैर रही थी, जैसे पानी और आकाश के बीच कोई अधूरी बात अटकी हो।

गौरी मंदिर के पास पहुँची ही थी कि सामने से मोहन आता दिखाई दिया। कुछ पल दोनों की नज़रें मिलीं, फिर वैसे ही झुक गईं जैसे दो लहरें किनारे पर आकर बिना शोर किए लौट जाती हैं।

मंदिर की घंटी दूर कहीं बजने लगी।

“आज देर हो गई,” मोहन ने धीमे से कहा।

गौरी मुस्कुरा दी।
“सूरज भी तो आज थोड़ा ठहरकर उगा है।”

दोनों कुछ कदम साथ चले। पगडंडी पर उनके पैरों के निशान बनते जा रहे थे, जिन्हें शायद कुछ ही देर में हवा और समय मिटा देने वाले थे।

तालाब में सूरज की परछाईं काँप रही थी। जैसे पानी भी इस मुलाकात को चुपचाप देख रहा हो।

“तुम रोज़ आती हो यहाँ?” मोहन ने पूछा।

“हाँ,” गौरी ने मंदिर की ओर देखते हुए कहा, “कभी भगवान के लिए… और कभी अपनेआप के लिए तो कभी सुबह की ताज़गी के लिए।”

मोहन ने उस रास्ते को देखा—वही मिट्टी, वही पेड़, वही तालाब। पर आज उसे लगा कि इस पगडंडी में सिर्फ रास्ता नहीं, एक इंतज़ार भी बसा है।

शायद यह पगडंडी हर दिन इन दोनों के कदमों को मिलाने के लिए ही बनी थी। सूरज अब थोड़ा ऊपर चढ़ आया था। धुंध धीरे-धीरे हट रही थी।

गौरी ने मंदिर में फूल चढ़ाए और लौटने लगी।
मोहन वहीं खड़ा रहा—कुछ सोचता हुआ।

उस दिन के बाद से मोहन भी हर सुबह उसी समय उस पगडंडी पर आने लगा।

और पगडंडी…
वह चुपचाप मुस्कुराती रही।
क्योंकि उसे पता था—

रास्ते हमेशा मंज़िलों तक ही नहीं जाते,
कभी अनजाने कदमों से रिश्ते बनाते हैं।
“आरती” इन मिट्टी की पगडंडियों का यही राज़ है—
कभी-कभी रास्ते चुपचाप दो दिलों तक पहुँच जाते हैं।

✍🏻 आरती परीख ११.३.२०२६
( दोपहर के १२.१५ )
खोबर, सऊदी अरब

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यहाँ खोबर में दो दिनों से बारिश हो रही थी तो आज की सुबह कुछ यह छवि जैसी हो थी।
हल्की सी ठंड और थोड़ी थोड़ी धुंध में लिपटी.. अलसाई सी.. सुबह।
तो आज मुझे इस विषय पर लिखने का भी बहुत मज़ा आया। 😍

हँसी की ओट में

हो सकता है
वह आँसुओं को
पलकों के पीछे
किसी पुराने संदूक की तरह
बंद कर आई हो।

हो सकता है
उसकी हँसी
घर की दीवारों पर
टंगी एक तस्वीर हो—
जिसे हर दिन
धूल से बचाना पड़ता है।

हो सकता है
वह चाय की भाप में
अपनी थकान घोल देती हो,
और बच्चों की हँसी में
अपनी चुप्पियाँ छुपा देती हो।

कई बार
स्त्रियाँ रोती नहीं—
वे बस
थोड़ा और मुस्कुरा देती हैं,
ताकि किसी को
उनके भीतर का
टूटता हुआ आकाश
न दिखे।

ज़रूरी नहीं कि
हँसती मुस्कुराती स्त्री
ख़ुश हो।

✍🏻 आरती परीख १०.३.२०२६

खाड़ी का सामान्य जीवन और मीडिया की युद्ध-छाया

खाड़ी का सामान्य जीवन और मीडिया की युद्धछाया

— एक प्रवासी भारतीय (NRI) की नज़र से

पिछले कुछ दिनों से भारतीय टीवी चैनलों और मीडिया पर खाड़ी देशों को लेकर लगातार तनाव और युद्ध की आशंकाओं से जुड़ी खबरें दिखाई जा रही हैं। तेज़ संगीत, लाल पट्टियों में चमकती “ब्रेकिंग न्यूज़” और बड़ी-बड़ी सुर्खियाँ—इन सबके बीच ऐसा माहौल बन जाता है मानो पूरा क्षेत्र किसी बड़े संकट के बीच खड़ा हो।

इन खबरों को देखकर भारत में बैठे हमारे परिवार, रिश्तेदार और मित्र स्वाभाविक रूप से चिंतित हो जाते हैं। फोन और संदेश आते हैं—“वहाँ सब ठीक तो है?”

एक प्रवासी भारतीय (NRI) के रूप में यहाँ रहकर जो जीवन मैं देखती हूँ, वह टीवी की सुर्खियों से कुछ अलग दिखाई देता है।

सावधानी और सतर्कता ज़रूर बढ़ी है। कई स्कूलों ने बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए फिलहाल कक्षाएँ ऑनलाइन कर दी हैं। घरों में बच्चे अब लैपटॉप और मोबाइल स्क्रीन के सामने बैठकर पढ़ाई जारी रखे हुए हैं। कुछ कार्यालयों ने भी कर्मचारियों को वर्क-फ्रॉम-होम या ऑनलाइन काम करने का विकल्प दिया है, ताकि अनावश्यक आवाजाही कम हो सके।

लेकिन इसके साथ ही जीवन पूरी तरह ठहरा हुआ नहीं है।

कारखाने पहले की तरह चल रहे हैं। बड़े-बड़े औद्योगिक प्लांटों में कर्मचारी अपनी-अपनी शिफ्ट में काम कर रहे हैं। तेल और ऊर्जा से जुड़े विशाल संयंत्रों में काम रुकना संभव भी नहीं होता, इसलिए वहाँ काम नियमित रूप से जारी है।

सरकारी कंपनियाँ, बैंक और कई निजी संस्थान भी सामान्य रूप से काम कर रहे हैं। लोग अपने दफ्तर जा रहे हैं, आवश्यक सेवाएँ चल रही हैं और आर्थिक गतिविधियाँ भी जारी हैं।

शहरों में निर्माण कार्य भी लगातार जारी है। कंस्ट्रक्शन साइटों पर कामगार रोज़ की तरह मेहनत कर रहे हैं, और नई इमारतें, सड़कें और परियोजनाएँ आगे बढ़ रही हैं।

हाँ, यह भी सच है कि जहाँ कहीं मिसाइल या ड्रोन हमलों की घटनाएँ हुई हैं या युद्ध जैसी स्थिति बनी है, उन विशेष क्षेत्रों को सेना और पुलिस ने तुरंत वर्जित क्षेत्र घोषित कर दिया है। वहाँ रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया गया है और सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है।

ऐसी परिस्थितियों में प्रशासन का पहला प्रयास यही होता है कि आम नागरिक सुरक्षित रहें। जो लोग अस्थायी रूप से अपने घरों से हटाए गए हैं, वे भी सुरक्षित स्थानों पर रहते हुए अपने जीवन को सामान्य बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।

इसी बीच यहाँ जीवन की एक और सुंदर तस्वीर भी दिखाई देती है। अभी रमादान का महीना चल रहा है और मौसम भी बेहद खुशनुमा है। रोज़ा खोलने के बाद यानी इफ़्तारी के समय शहरों की रौनक अलग ही दिखाई देती है।

परिवार के साथ लोग कॉर्निश—यानी समुद्र तट—पर टहलने निकलते हैं। बच्चे खुले मैदानों में खेलते हुए दिखाई देते हैं, कई लोग जॉगिंग करते हैं, तो कुछ लोग बस समुद्र की ठंडी हवा के साथ कुछ शांत पल बिताते हैं।

रमादान के कारण शहरों की रातें भी काफी जीवंत रहती हैं। शॉपिंग मॉल और लोकल मार्केट देर रात तक खुले रहते हैं—कई जगहों पर तो रात के एक-दो बजे तक भी रौनक बनी रहती है। लोग आराम से खरीदारी कर रहे हैं और जीवन की आवश्यक वस्तुएँ भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। इसलिए आम लोगों के बीच किसी तरह की घबराहट या अफरा-तफरी दिखाई नहीं देती।

खाड़ी के देशों में रहने वाले लाखों भारतीयों के लिए यह क्षेत्र केवल खबरों का भूगोल नहीं है। यह वह जगह है जहाँ उनके श्रम, उनके सपने और उनके परिवारों की उम्मीदें जुड़ी हुई हैं। यहाँ काम करने वाले इंजीनियर, डॉक्टर, शिक्षक, तकनीशियन और मजदूर—सभी अपने परिश्रम से इस क्षेत्र की प्रगति में योगदान देते हैं और अपने परिवारों का भविष्य भी संवारते हैं।

इसलिए जब खबरों में अत्यधिक नाटकीयता दिखाई देती है, तो कई बार वास्तविकता और प्रस्तुति के बीच अंतर महसूस होता है। समाचार दिखाना आवश्यक है, लोगों को जागरूक करना भी जरूरी है, लेकिन संतुलन और जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

क्योंकि हर सुर्खी के पीछे लाखों लोगों का जीवन जुड़ा होता है।

आज खाड़ी में रहने वाले लोगों की वास्तविकता यही है कि सावधानी के साथ जीवन आगे बढ़ रहा है—बच्चे ऑनलाइन पढ़ रहे हैं, लोग अपने काम में लगे हैं, प्लांट और फैक्ट्रियाँ चल रही हैं, निर्माण कार्य जारी है, और शाम को इफ़्तारी के बाद समुद्र तट पर टहलते परिवार और खेलते बच्चे यह बताते हैं कि सामान्य जीवन की धड़कन अब भी जारी है।

सुर्खियाँ चाहे जितनी बेचैन हों, यहाँ की शामों में समुद्र की हवा अब भी वही सुकून लेकर आती हैजो हमें याद दिलाती है कि जीवन का प्रवाह किसी भी भय से बड़ा होता है।
✍🏻 आरती परीख ७.३.२०२६

उड़ चल रे पंछी

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Painting by Smriti Singh

खिड़की में खड़ा,
अब जवां हो गया है ये पंछी,
ख़्वाहिशों को चूमने,
आज बेचैन है ये पंछी।

नीले आसमान में,
उड़ने को बेकरार ये पंछी,
अपने ही परों पर लिखेगा
नया इकरार ये पंछी।

उड़ चल रे पंछी,
हाँ…
आज उड़ चल रे पंछी,
बांध न खुद को डाली से,
तेरी राहें बुलाएँ तुझे,
खुले हुए हरियाली से।

डर के बादल छँट जाएँगे,
हौसले की लाली से —
उड़ चल रे पंछी…
हाँ.. उड़ चल रे…

सुबह की पहली धूप बनेगी
तेरी आँखों की चमक,
हर ठोकर में छुपी होगी
एक नई सी दमक।

कल तलक जो सहमा-सहमा था,
आज वही तेरा अरमान बना,
टूटे सपनों की राख से,
फिर से आसमान बना।

हाँ.. उड़ चल रे पंछी…

हवाओं से दोस्ती करना,
और बादलों से बातें,
सीमाएँ जो बाँधे अगर
उनसे कहीं न गभराना।

धरती भी तेरी अपनी है,
आसमां भी तेरा घर,
मन की खिड़की खोल दे,
बस उड़ जा बेख़बर।

हाँ.. उड़ चल रे पंछी..

खिड़की कल खाली होगी,
पर यादें मुस्काएँगी,
उसकी उड़ती छाया में,
नई दिशाएँ आएँगी।

अब जवां हो गया है ये पंछी,
सपनों का सारथी,
उड़ान ही उसकी पहचान —
वही मन-मंदिर की “आरती”।

उड़ चल रे “आरती”
उड़ चल रे..

✍🏻 आरती परीख २३.२.२०२६

स्वर्ग यहाँ


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Painting by Smriti Singh

बागों में ठहरी हँसी,
बादलों में छुपी रोशनी,
तेरे संग ये पल जो मिले—
लगता है मिल गई ज़िंदगी।


बागों में ठहरी हँसी…
तू पास हो तो सुहानी लगे जिंदगी।


सरसों की खुशबू,
हवा की सरगम,
दूर पहाड़ों की चुप कहानी,
तेरे कंधे पर
सिर रखे मैं
भूल गई हर परेशानी।


तेरी हँसी जैसे सावन बरसे,
मेरी धड़कन बन जाए सुरीला राग,
इन सुनहरी दोपहरों में
बस तू ही तू हर एक आगाज़।


बागों में ठहरी हँसी,
आँखों में तेरी चाँदनी,
तेरे संग लेटा हुआ ये ज़मीं—
लगता है जैसे स्वर्ग यहीं।


बालों में उलझी ये धूप नरम,
तेरी उँगलियों की शरारत,
वक़्त ठहर कर देख रहा
हमारे प्यार की ये नज़ाकत।


दूर कहीं पंछी गुनगुनाएँ,
हवा लिखे कोई गीत नया,
तेरी बाँहों की इस दुनिया में
मुझे मिला मेरा प्यारा जहाँ।


ना शहर की भागमभाग यहाँ,
ना कोई झूठी चमक,
बस खेतों की सादगी में
दिल ने दिल को छुआ समज।


बागों में ठहरी हँसी,
तेरी मेरी ये दिल्लगी,
जब तक साँसों में साँस रहे—
याद रहेगी ये सादगी।


बागों में ठहरी हँसी…
तू साथ रहे तो—
हर लम्हें में गूँजे “आरती”।
बागों में ठहरी हँसी…
तू साथ रहे तो—
हर लम्हें में गूँजे “आरती”।
तू साथ रहे तो—
हर लम्हें में गूँजे “आरती”।

✍🏻 आरती परीख १६.२.२०२६

दिल को बाँध कर रखना

“दिल को बाँध कर रखना”
— एक छोटी-सी नज़्म

दिल को बाँध कर रखना,
ये बहुत आवारा होता है,
कभी यादों की गलियों में भटकता,
कभी ख़्वाबों के संग सोता है।

इसे हर मुस्कान पे मत वारो,
हर आहट को सच मत मानो,
ये मासूम है, जल्दी मान जाता है—
फिर चुपचाप रोता है, कुछ भी न जानो।

दिल को बाँध कर रखना,
पर ज़ंजीरों से नहीं…
विश्वास की नरम डोरी से,
आत्मसम्मान की मज़बूत गाँठ से।

ताकि जब ये उड़ना चाहे—
तो पंख कटे नहीं,
और जब लौटना चाहे—
तो घर उजड़ा न मिले।

दिल को बाँध कर रखना…
मगर इतना भी नहीं
कि धड़कनों की आवाज़
ख़ुद तुमसे ही दूर हो जाए।
✍🏻 आरती परीख २०.२.२०२६

सूखी डाल से रंगीन स्वप्न-किरण

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छवि विचार :-

दृश्य कथा : “सूखी डाल से रंगीन स्वप्नकिरण

सर्दियों की हल्की धूप खिड़की से छनकर कमरे में उतर रही थी। कमरे के कोने में, एक सूखी-सी डाल खिड़की के बाहर झुकी थी, जैसे समय ने उसे वहीं रोक दिया हो।

आज बहुत लंबे अंतराल के बाद उस डाल पर दो पंछी आकर बैठे—चुपचाप। फिर भी उनकी उपस्थिति में एक अजीब-सी गूंज थी।

खिड़की के अंदर, ज़मीन पर बैठी अनसूया एकदम चुप थी। उसकी गोद में एक खुली किताब उलटी पड़ी थी, मानो पढ़ते-पढ़ते शब्द उससे रूठ गए हों। पास ही एक खाली कटोरी थी, जिसमें कभी चाय की भाप उठती होगी। आज बस ठंडा सन्नाटा था।

अनसूया अक्सर इस खिड़की के पास बैठती। बाहर का पेड़ उसे अपना-सा लगता… सूखी टहनियाँ, जैसे उसके अपने अधूरे ख़्वाब। हवा जब उन टहनियों से टकराती, तो एक धीमी-सी सरसराहट होती; उसे लगता, कोई उसे पुकार रहा है।

उस दिन जब दो पंछी आकर बैठे तो अनसूया ने पहली बार उन्हें ध्यान से देखा। एक पंछी थोड़ा आगे था, दूसरा पीछे। दोनों एक-दूसरे की ओर ऐसे मुख किए थे, जैसे आगे वाला राह दिखा रहा हो। वे डाल पर संतुलन बनाए हुए थे—बिना डरे, बिना झिझके।

अनसूया के भीतर कुछ हिला।

उसे याद आया कि वह भी कभी ऐसी ही डाल पर बैठी थी, सपनों की डाल पर। जीवन ने जब करवट बदली, तो उसने अपने पंख समेट लिए। उसे लगा था कि उड़ान अब उसके हिस्से में नहीं रही।

लेकिन आज उन पंछियों को देख, उसे समझ आया—डाल भले ही सूखी हो, उड़ान फिर भी संभव है।

अनसूया ने धीरे से किताब उठाई। इस बार पढ़ने के लिए नहीं, लिखने के लिए। उसने पन्ने पर पहला शब्द लिखा—“आज।”
फिर लिखा—“मैं डरूँगी नहीं।”

स्याही अभी गीली ही थी कि खिड़की के बाहर एक पंछी ने पंख फड़फड़ाए। दूसरा उसके पीछे-पीछे उड़ गया। डाल फिर अकेली रह गई, पर आज खाली नहीं थी—उस पर उड़ान की स्मृति अब भी मुस्कुरा रही थी।

अनसूया ने खिड़की खोली। ठंडी हवा भीतर आई, उसके बालों को छूती हुई… उसने गहरी साँस ली और दिल से मुस्कुरा उठी।

फिर उसने वही किताब उठाकर अगला वाक्य लिखा—
“मैं प्रतीक्षा नहीं करूँगी कि कोई मुझे उड़ने की अनुमति दे।”

उसके शब्दों में अब कंपन नहीं था। वे स्थिर थे, जैसे कोई भीतर खड़ा होकर उसका हाथ थामे हो।

उसने कमरे को देखा—दीवारें, मेज़, खाली कटोरी… सब वही था। पर कुछ बदल चुका था। शायद बाहर नहीं, उसके भीतर।

धीरे-धीरे वह उठी। अलमारी से पुराने रंग निकाले। बरसों पहले वह चित्र बनाती थी—रंगों में अपनी चुप्पियाँ घोल देती थी। उसने कागज़ फैलाया और पहली रेखा खींची—एक सूखी डाल।

फिर उसी डाल पर दो छोटे पंछी।

पर इस बार चित्र में डाल के सिरे पर एक छोटी-सी हरी कोंपल भी थी।

सूरज ढलने लगा था। कमरे में सुनहरी रोशनी फैल गई। अनसूया ने चित्र को देखा और जाना—उसे अब किसी के लौटने का इंतज़ार नहीं है। उसे बस अपने भीतर की कोंपल को सींचना है।

कभी-कभी जीवन में कोई शोर नहीं होता, कोई बड़ा चमत्कार नहीं घटता। बस एक सूखी डाल पर दो पंछी आकर बैठते हैं—और हमें याद दिला जाते हैं कि हम अब भी जीवित हैं।

उस दिन खिड़की के उस पार की चुप्पी टूटी नहीं थी—
बस उसने अपना अर्थ बदल लिया था।

उसी सूखी डाल से फूटी थी एक रंगीन स्वप्न-किरण।
अनसूया ने उसे अपने भीतर उतरते महसूस किया—
और बरसों से बेरंग पड़ी उसकी ज़िंदगी में
आशा की पहली कोंपल चुपचाप खिल उठी।

✍🏻 आरती परीख १८.२.२०२६

स्वतः की मिट्टी

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Painting by Smriti Singh

जब हम अपने‑आप के साथ जीना सीख लेते हैं,
तो कोई हमें दु:खी नहीं कर सकता।

क्योंकि तब
अपेक्षाएँ दूसरों से नहीं,
बल्कि समझ अपने भीतर के सन्नाटे
और सूरज से अंकुरित होती हैं।

तब अकेलापन डर नहीं रहता,
यह चाँद की ठंडी रौशनी बनकर
हमारी तन्हाई में धीरे‑धीरे घुल जाता है।

और साथ होना…
किसी की मजबूरी नहीं,
बल्कि हवा में बिखरी खुशबू बन जाता है—
स्वाभाविक, मुक्त।

हम मुस्कुराते हैं
बिना गवाहों के,
जैसे सागर की लहरें किनारे को धीरे‑धीरे छूती हैं।

हम रोते हैं
बिना अपराधबोध के,
जैसे बरसात की बूंदें पत्तों से टकराकर बह जाती हैं,
निश्छल, बेहिसाब।

जब हम अपने‑आप के साथ
जीना सीख जाते हैं,
तो हम खुद की मिट्टी में
अंकुरित होते हैं,
जड़ें गहरी,
शाखाएँ आकाश की ओर फैलती…
और फिर
कोई हमें
हमारी जड़ से जुदा नहीं कर सकता।

✍🏻 आरती परीख

स्त्री की चाह

शांत धरा-सा धैर्य सजाए, मन में गहरी शान।
अंतर में तूफ़ान छुपाए, मुख पर मधु मुस्कान।।

कंधों पर संसार उठाए, चलता निर्विकार।
अपने सब दु:ख दर्द छुपाए, दे देता उपहार।।

वज्र-हृदय सा दिखता बाहर, भीतर कोमल गान।
मुस्कुराता आँसू पीकर, देता सबको मान।।

छाया बनकर साथ निभाए, करे कठिन आसान।
सच्चा पुरुष वही कहलाए, रखे सभी का ध्यान।।

थामे हाथ विश्वास भरा जब, मिटे सब का अज्ञान।
चुप ताक़त में झलके तब, नारी का सम्मान।।

सफलता में भागीदार बने, हार में रखे ध्यान।
स्नेह से मार्गदर्शक बने, संकट में बने वरदान।।

सात जन्म का व्रत निभाए, करे नारी सम्मान।
“आरती” जीवनसाथी चुनिए, न हो पुरुषप्रधान ।।
✍🏻 आरती परीख १३.२.२०२६

—————
सरसी छंद
१६ + ११ (तुकांत गुरु लघु)
चारों पंक्तियां समतुकांत

स्मृति की आँच

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छवि विचार
कहानी : “स्मृति की आँच”

दादाजी अपने बीते दिनों की बातें याद करते हुए रोज़ रात को पौराणिक कथाएँ सुनाते थे।

सर्दियों की वे लंबी रातें जैसे उनके इंतज़ार में ठहर जाती थीं। मिट्टी के चूल्हे में जलती लकड़ियों की आँच पूरे कमरे को सुनहरी रोशनी से भर देती, और हम सब—मैं, मेरा चचेरा भाई, गुड़िया सी मेरी छोटी बहन और मेरी माँ—उनके इर्द-गिर्द गोल घेरा बनाकर बैठ जाते थे।

दादाजी की सफ़ेद दाढ़ी आग की लौ में और भी उजली लगती। उनकी आँखों में न जाने कितने युगों की परछाइयाँ तैरती रहतीं। जैसे ही वे अपना पुराना लकड़ी का आसन संभालते, हमें पता चल जाता कि, आज फिर किसी देव, किसी ऋषि, या किसी वीर की कथा जन्म लेने वाली है।

“जब समुद्र मंथन हुआ था…”
वे धीमे से शुरू करते, और हमारी साँसें थम जातीं।

उनकी आवाज़ में अजीब जादू था। कभी वह गर्जन बन जातीजैसे देव और दानव सचमुच आमने-सामने खड़े हों तो कभी वह नदी की तरह शांत बहतीजब वे किसी तपस्वी की साधना का वर्णन करते थे।

पर सच कहूँ तो,
वे केवल पौराणिक कथाएँ नहीं सुनाते थे। हर कथा के बीच कहीं-न-कहीं उनका अपना ख़ुद का जीवन छिपा होता था।

जब वे भगवान राम के वनवास की बात करते, तो उनकी आँखें भीग जातीं… जैसे उन्हें अपना बिछड़ा गाँव याद आ गया हो।
जब वे भीम की ताकत का वर्णन करते, तो मुस्कुरा कर कहते, “ताकत शरीर की नहीं, इरादे की होती है।”

और जब वे कृष्ण की लीला सुनाते, तो बातों बातों में कोई न कोई सिख अचूक जोड़ देते, “शरारत भी तभी अच्छी लगती है, जब उसमें करुणा हो।”

मुझे याद है.. एक रात मैंने पूछ ही लिया था, “दादाजी, ये सब आपको कैसे याद है?”

वे हँसे।
“बिटिया, कहानी याद नहीं रखी जाती… कहानी जी जाती है। जो जी ली जाए, वो कभी भूलती नहीं।”

उस दिन पहली बार मैंने गौर से देखा, उनके हाथों की झुर्रियों में भी जैसे कथाएँ लिखी थीं। उन हाथों ने खेत जोते थे, बाढ़ देखी थी, सूखा झेला था, कारखानों के धुवें में काम करते हुए आज़ादी के गीत सुने थे, आज़ाद हिंद फ़ौज के सदस्य भी थे। उनकी हर कहानी में एक सीख होती थी पर वह सीख उपदेश की तरह नहीं, अनुभव की वाणी बोलती थी।

धीरे-धीरे हमें समझ आने लगा कि, दादाजी हमें केवल देवताओं के चमत्कार नहीं सुना रहे थे; वे हमें धैर्य, साहस, प्रेम और त्याग का अर्थ सीखा रहे थे।

समय बीतता गया।
हम बड़े हो गए।
चूल्हे की जगह गैस ने ले ली, मिट्टी की दीवारों की जगह पक्के घर ने।

पर आज भी जब सर्द हवा खिड़की से टकराती है, तो मुझे वही सुनहरी रोशनी याद आती है… और दादाजी की आवाज़—
“हर युग में राक्षस बाहर नहीं होते, कभी-कभी भीतर भी होते हैं। और हर मनुष्य में एक देवता भी सोया होता है।”

अब समझ में आता है—
दादाजी की सबसे बड़ी पौराणिक कथा कोई पुरानी कहानी नहीं थी…
वह स्वयं उनका जीवन था।

और हम, उस कथा के छोटे-छोटे श्रोता, आज भी उनके शब्दों की गर्माहट में अपने समय की ठंड से बच जाते हैं।

✍🏻 आरती परीख ११.२.२०२६

तिरछी नज़र

भौंहों की इक हल्की सी हरकत में ठहराव है,
तेरी तिरछी नज़र में अटका तेरा जवाब है।

आँखों की कोर से जब मौसम सा बह जाता है,
नज़रों की उस ख़ामोशी में हमारा ख़्वाब है।

न सवाल मुकम्मल, न जवाब पूरा-पूरा,
तेरी निगाहों में उलझा हर इक हिसाब है।

लफ़्ज़ों की क्या मजाल जो सब कुछ कह पाएँ,
तेरी चुप निगाहों का अपना ही असर-ओ-आब है।

सीधी कभी नहीं होती, फिर भी दिल तक पहुँचे,
तेरी तिरछी नज़र ही मोहब्बत का सवाब है।

“आरती”, ये नज़र पल भर के लिए ठहर जाए,
ये साँसों के लिए वही जीवन-ए-आफ़ताब है।

✍🏻 आरती परीख १०.२.२०२६

गीत : तिरछी नज़र

तेरी तिरछी नज़र, सैंया, मार गई हाय…
सीधी बात न कहे,
दिल ले गई हाय…
तेरी तिरछी नज़र, सैंया, मार गई हाय…

भौंहों की हल्की सी कसमसाहट में,
अधूरी कहानी ठिठक जाए हाय…
आँखों की कोर से
मौसम जो बह निकले,
चुप्पी ही सारा राग सुनाए हाय…

न सवाल पूरा, न जवाब मिले,
बीच पलों के मन अटक जाए हाय…

तेरी तिरछी नज़र, सैंया, मार गई हाय…

नज़रों में लिपटी जो मीठी चुप्पी,
बोल बिना सब कह जाए हाय…
शब्द तो ठहरे
दर पे खड़े-खड़े,
निगाह ही दिल तक पहुँच जाए हाय…

सीधी राह न जाने ये अँखियाँ,
टेढ़े ही प्रेम सिखाए हाय…

तेरी तिरछी नज़र, सैंया, मार गई हाय…

आ… आ…
नैनन की बँसुरी,
साँसों में राग भर जाए…
तिरछी नज़रिया सैंया,
जीवन की लय बन जाए…

तेरी तिरछी नज़र, सैंया, मार गई हाय…
उम्र भर का हिसाब
एक पल में कर जाए हाय…

✍🏻 आरती परीख १०.२.२०२६

अब फ़रियाद नहीं

अब फ़रियाद नहीं,

अब मैं ही आवाज़ हूँ,

अब फ़रियाद नहीं,

अब मैं ही आवाज़ हूँ।

जो माँगा था कभी

रो-रो के हर बार,

वो भीतर ही छुपा था—

ये समझ गई हूँ आज।

टूटे विश्वासों से

जो राह बनी है,

वही राह अब मेरे

अस्तित्व की पहचान है।

अब फ़रियाद नहीं,

अब मैं ही आवाज़ हूँ…

हर ठोकर ने सिखाया

माथा कैसे झुके,

हर पीड़ा ने बताया

दीप कैसे जले।

ना शोर की चाह है,

ना दिखावे का ज्ञान,

मौन की लौ से ही

गढ़ी है मेरी पहचान।

अब फ़रियाद नहीं,

अब मैं ही आवाज़ हूँ…

अगर शब्द थम जाएँ

तो डरती नहीं,

ख़ामोशी भी कहती है

जो कहा नहीं।

ना डर की हुकूमत

अब मन पर चले,

ना नकारात्मक सोच

मेरे पाँव बाँधे।

मैं गिरती हूँ तो

और मज़बूत होकर उठती हूँ—

यही मेरी जीत है।

अब फ़रियाद नहीं,

अब मैं ही आवाज़ हूँ,

अब फ़रियाद नहीं—

अब मैं ही आवाज़ हूँ।

✍🏻 आरती परीख ९.२.२०२६

मौसम-ए-इश्क़

इश्क़ करनेवालों को
महीनों से क्या लेना-देना है… सजनवा।

जनवरी की सर्द रातों में
जब तेरा नाम होंठों पर आया,
शाल ने देह को ढाँपा
पर मन तो तुझमें सिमट आया।

फ़रवरी की हल्की धूप में
आँगन में बैठी मैं मुस्काई,
लगा—ये धूप नहीं उतरी है,
तेरी बाँहों की याद चली आई।

मार्च की चंचल हवाओं ने
आँचल मेरा बार-बार छेड़ा,
मैं हँस दी—जैसे तूने ही
शरारत से छू लिया हाथ मेरा।

अप्रैल की तपती दोपहरी में
पसीने-सा ढलता रहा इंतज़ार,
मई की लू में भी जल न पाई,
तेरे भरोसे की ठंडी धार।

इश्क़ करनेवालों को
महीनों से क्या लेना-देना है… सजनवा॥

जून की आँखों में बादल थे,
सावन की देह में मैं भीग गई,
जुलाई की हर बूँद, ओ सजनवा,
तेरे नाम की सरगम लिख गई।

अगस्त की मिट्टी की ख़ुशबू में
पायल-सी बजती रही चाहत,
सितंबर की चुप नमी में
और गहरी हुई मेरी आदत।

अक्टूबर दीप जलाकर आई,
नवंबर धुंध में लिपट गया,
तेरी याद की आँच से ही
हर ठंडा दिन सुलग गया।

दिसंबर की काँपती साँसों में
‘आरती’ ने ख़ुद से इतना कहा—
महीनों की गिनती क्या करूँ?!
जब तू ही; मेरा मौसम बन गया।

इश्क़ करनेवालों को
महीनों से क्या लेना-देना है…
ओ मेरे मितवा..
जब
एक ही नाम
जीवनभर गुनगुनाता रहे—
‘आरती’ का दिल॥ ❣️

✍🏻 आरती परीख ८.२.२०२६

भीतर का सूरज

जो चुभा, वही चेतना बना,
जो दर्द था, वही साँस रहा।
अगर सब आसान होता यहाँ,
तो जीना भी बस एक आदत रहा।

हाँ,
अगर सब आसान होता यहाँ,
तो जीना भी बस एक आदत रहा।

ठोकरों ने चलना सिखाया हमें,
अँधेरों ने दीये जलाए भीतर।
हर गिरावट ने पूछा ख़ामोशी से—
क्या सच में जीना है,
हाँ सोचो..
क्या सच में जीना है,
या बस ऐसे ही रह जाना है इधर?

हाँ,
अगर सब आसान होता यहाँ,
तो जीना भी बस एक आदत रहा।

जब टूटा मन, तब ही जाना,
हाँ;
जब टूटा मन, तब ही जाना,
वजूद यूँ ही नहीं आकार लेता।
आग में तपकर ही इंसान
अपने ही भीतर का सूरज देखता।
हाँ;
आग में तपकर ही इंसान
अपने ही भीतर का सूरज देखता।

हाँ,
अगर सब आसान होता यहाँ,
तो जीना भी बस एक आदत रहा।

इसलिए; जो चुभन बची है आज,
उसे शिकायत नहीं—
संकेत मानती हूँ।
क्योंकि
जो भीतर अब तक जल रहा है,
वही कहता है—
“आरती” ज़िंदा है,
हाँ, आरती ज़िंदा है,
और सचमुच… जी रही है,
हाँ, सचमुच जी रही है आरती।

✍🏻 आरती परीख ७.२.२०२६

ख़्वाब

सदियों से अँखियों में छुपा है एक ख़्वाब,
हाँ..आ..आ..
सदियों से अँखियों में छुपा है एक ख़्वाब,
होठों की ख़ामोशी में हर रोज़ नापा है ख़्वाब।

चुपके-चुपके जागती रहती है रातें मेरी,
सन्नाटों की धड़कन में दबा है ख़्वाब।

हाँ..आ..आ..
सदियों से अँखियों में छुपा है एक ख़्वाब..

ना किसी से बाँटा, ना ही किसी से पूछा,
दिल के कोने में बरसों सजा है ख़्वाब।

हाँ..आ..आ..
सदियों से अँखियों में छुपा है एक ख़्वाब..

भीड़ में रहते हुए भी तन्हा-सी मेरी रूह,
मौन की आग में चुपचाप सुलगा है ख़्वाब।

हाँ..आ..आ..
सदियों से अँखियों में छुपा है एक ख़्वाब..

एक दिन पंख फैलाकर उड़ जाएगा,
नीले गगन को छूने को बेकरार है ख़्वाब।

हाँ..आ..आ..
सदियों से अँखियों में छुपा है एक ख़्वाब..

जो अधूरा लगता है आज,
हाँ.. जो अधूरा लगता है आज, वो कल होगा पूरा,
नींद में यही गुनगुनाता है “आरती” का ख़्वाब।
हाँ.. जो अधूरा लगता है आज, वो कल होगा पूरा,
नींद में यही गुनगुनाता है “आरती” का ख़्वाब।

हाँ.. आ..
सदियों से अँखियों में छुपा है जो ख़्वाब,
“आरती” ज़रूर से पूरा होगा वो ख़्वाब।

✍🏻 आरती परीख ६.२.२०२६

आलम-ए-इश्क़

तेरी आँखों का स्पर्श; कुछ इस कदर मुलायम रहा,
जुदाई के मौसम में भी; तू ही मेरा यार रहा।
हाँ..
जुदाई के मौसम में भी; तू ही मेरा यार रहा।

तेरे होठों की खामोशी ने; जो बातें कह दीं मुझसे,
हलचल से परे, प्यार का मीठा राग रहा।
हाँ..

तेरी आँखों का स्पर्श; कुछ इस कदर मुलायम रहा,
जुदाई के मौसम में भी; तू ही मेरा यार रहा।
हाँ..

छुआ जब तूने बिना छुए; एहसासों के दर से,
मेरी आत्मा पर, तेरा नाम उम्र-भर साथ रहा।
हाँ..

तेरी आँखों का स्पर्श; कुछ इस कदर मुलायम रहा,
जुदाई के मौसम में भी; तू ही मेरा यार रहा।
हाँ..

तेरे सामने; ढह गईं सारी तर्कों की दीवारें,
प्यार वहीं जीता, जहाँ हर हिसाब साफ़ रहा।
हाँ..

तेरी आँखों का स्पर्श; कुछ इस कदर मुलायम रहा,
जुदाई के मौसम में भी; तू ही मेरा यार रहा।
हाँ..

आरती ने पूछा नहीं; तक़दीर से तेरा होना,
हाँ.. आ..
आरती ने पूछा नहीं; तक़दीर से तेरा होना,
क्योंकि तू जो मिला..
हाँ.. तू जो मिला..
मेरा जीवन आसान रहा।
हाँ..आ..
कभी आरती ने पूछा नहीं; तक़दीर से तेरा होना.. आ..
क्योंकि, तू जो मिला.. आरती का जीवन आसान रहा.. आ..

✍🏻 आरती परीख ६.२.२०२६

अद्भुत सफ़र

प्रेम को पाने का सफ़र, प्रेम से भी अद्भुत है,
दिल की धीमी धड़कन में जो बसे—वो लम्हा अद्भुत है।

प्रेम को पाने का सफ़र…
प्रेम से भी अद्भुत है..

धड़कनों में आग भर दे, बस ज़रा-सी छुअन,
बिन कहे जो सब कह जाए—वो ख़ामोशी अद्भुत है।

प्रेम को पाने का सफ़र…
प्रेम से भी अद्भुत है…

डर की देह पर जब चाहत, प्यार से दस्तक दे,
हर जोखिम भी तब लगता है—कुछ अपना अद्भुत है।

प्रेम को पाने का सफ़र…
प्रेम से भी अद्भुत है…

काँपते क़दम, फिर भी दिल रुकना सीखे नहीं,
इस अनजाने में उतरने का नशा अद्भुत है।

प्रेम को पाने का सफ़र…
प्रेम से भी अद्भुत है…

न कोई मंज़िल तय होती, न लौटने का रास्ता,
फिर भी आगे बढ़ते रहना—ये भरोसा अद्भुत है।

प्रेम को पाने का सफ़र…
प्रेम से भी अद्भुत है…

यहाँ मैं टूट-सी जाती हूँ, वहाँ से उगती भी हूँ,
ख़ुद से मिलने की इस राह की चमक अद्भुत है।

प्रेम को पाने का सफ़र…
प्रेम से भी अद्भुत है…

आरती, प्यार मिले न मिले—शिकवा कैसा, कहो,
रूह तक ले जाए जो सफ़र—वो सपना अद्भुत है…
हाँ… आ… आ…

आरती, प्यार मिले न मिले—शिकवा कैसा, कहो,
प्रेम को पाने का सफ़र, प्रेम से भी अद्भुत है…
आरती.. दिल की धीमी धड़कन में जो बसे—
वो लम्हा…
वो लम्हा…
अद्भुत है…
हाँ.. आरती.. वो लम्हा अद्भुत है…

✍🏻 आरती परीख ५.२.२०२६

सीमारेखा

मैं थक गई हूँ

मेरे अंदर के शोर से,

उस शोर से

जो घर की दीवारों के बीच

कर्तव्य बनकर गूँजता है,

और समाज की भीड़ में

मर्यादा का नाम ओढ़े

मुझसे मेरी ही आवाज़ माँग लेता है।

हर क्लेश के बाद

मुझसे यही अपेक्षा रही—

समझदार बनो,

संयम रखो,

और सब कुछ

चुपचाप सँभाल लो।

पर किसी ने नहीं पूछा

कि सँभालते-सँभालते

मेरे भीतर

क्या टूट रहा है।

अपने ही लोगों के शब्द

सबसे गहरे उतरते हैं,

क्योंकि वही जानते हैं

कहाँ स्पर्श से अधिक

चोट लगती है।

कभी रिश्तों के नाम पर,

कभी रीति के नाम पर—

मेरी सहनशीलता

मेरी पहचान बना दी गई।

आज मैं साफ़ कहती हूँ—

आत्मसम्मान

अहंकार नहीं है,

और आत्मसंरक्षण

स्वार्थ नहीं।

मेरी ख़ामोशी

कमज़ोरी नहीं,

और मेरी दूरी

किसी को दंड देना नहीं—

यह बस

अपने मन को

सुरक्षित रखने की

एक सधी हुई कोशिश है।

मैं रिश्ते निभाऊँगी,

पर अपनी अस्मिता

गिरवी रखकर नहीं।

मैं समझूँगी,

पर हर बार

समझौता नहीं करूँगी।

मैं नरम हूँ—

पर बिखरने के लिए नहीं।

मैं झुक सकती हूँ—

पर मिटने के लिए नहीं।

और अब

मैं किसी को भी

यह साबित नहीं करूँगी

कि मैं कितनी सहनशील हूँ।

मेरी शांति

मेरी सहमति नहीं है।

मेरा मुस्कुराना

मेरी सीमाओं का त्याग नहीं।

जहाँ सम्मान होगा,

वहाँ मेरा पूरा मन होगा।

और जहाँ

मेरे अस्तित्व को

आदत समझ लिया जाएगा,

वहाँ मेरी अनुपस्थिति

मेरी अंतिम—

पर शालीन प्रतिक्रिया होगी।

कोई विद्रोह नहीं,

कोई घोषणा नहीं—

बस

अपने ही भीतर

सुरक्षित रहने का

कोमल,

पर अटल निर्णय।

✍🏻 आरती परीख ४.२.२०२६