
मेरे ख्वाबों की पलकों के तले,
ये कौन आ बैठा?
मेरे सहर की, नरम ओस सा,
मेरे सपनों की, भूली आहट सा,
ये कौन आ बैठा? ये कौन आ बैठा?
मेरे कोलाहल की खामोशी सुनने,
मेरे सन्नाटों की तारे छूने,
ये कौन आ बैठा? ये कौन आ बैठा?
मेरे अरमानों के क्षितिज पर, एहसासों के
पंख लिए, यह कौन आ बैठा?
ये कौन आ बैठा?
– पथिक









