कौन ?

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मेरे ख्वाबों की पलकों के तले,
ये कौन आ बैठा?

मेरे सहर की, नरम ओस सा,
मेरे सपनों की, भूली आहट सा,
ये कौन आ बैठा? ये कौन आ बैठा?

मेरे कोलाहल की खामोशी सुनने,
मेरे सन्नाटों की तारे छूने,
ये कौन आ बैठा? ये कौन आ बैठा?

मेरे अरमानों के क्षितिज पर, एहसासों के
पंख लिए, यह कौन आ बैठा?
ये कौन आ बैठा?

– पथिक


पल

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इस पल के, पल में ठहर जाऊं,

ना इस पार – ना उस पार।

इस पल के, गर्भ में समां जाऊं,

ना पल भीतर – ना पल बाहर।

इस पल को थाम, समय में गहरे उतर जाऊं,

ना पल तेरे – ना पल डूबे।

इस पल, सकल संपूर्ण हो बहती जाऊं,

खुद को खो – यह पल बन जाऊं।

– पथिक

हयात

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जाने कहां थे तुम,

ना जाने कहां थे हम।

तेरा साथ मेरे सरमाया,

हर क्षण जीवन मेरा उलझाया।

अतीत के साए थे,

या आने वाले कल के झोंके।

जाने कहां थे तुम,

ना जाने कहां थे हम।

सन्नाटे की ठंड सा,

सहमा यह आलम सारा।

कोहराम की कर्कश,

नाद सा सूनापन हमारा।

जाने कहां थे तुम,

ना जाने कहां थे हम।

क्या खोया, क्या कमाया,

इसी में सारा जीवन समाया।

ना पल पाया ,ना पल जिया,

जाने किस भ्रम में पथ ये आया।

– पथिक

डर

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अपने डर को जीना सीखो,

तुम जिंदा हो यह बतलाता है।

अपने डर से प्यार करो,

तुम जीत की राह पर हो दिखलाता है।

अपने डर से लड़ना सीखो,

तुम गिर कर उठ सकते हो सीखलाता है।

अपने डर का स्वागत करो,

तुम दुनिया का वह ताज बतलाता है।

डर ना होता ,हम ना होते,

तुम ना होते ,यह साहस ना होता।

– पथिक

झोंका

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लो आज फिर अतीत से वो झोंका आया है,

अपने संग यादों का वो तोहफा लाया है,

कुछ खट्टे मीठे वो पल साथ लाया है,

लो आज अतीत से वो झोंका आया है।

साथ उठा लाया उन सपनों की वो पोटली,

जिन्हे कभी फर्ज अपने संग दबा लाया था,

कसक उन अधूरे सपनों की वह संग लाया है,

लो आज फिर अतीत से वो झोंका आया है।

संग लाया उन बातों जज्बातों को वो जिन पर मैं इतराया था,

हिम्मत भरे वो पल जिन्हे में जीत लाया था,

आज भी याद कर उन लम्हों को मन मेरा मुस्कुराया है,

लो आज फिर अतीत से वो झोंका आया है।

– पथिक

सफर

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भीड़ के अकेलेपन का,

वो संग हो तुम।

दर्द के लम्हों का,

वो मरहम हो तुम।

एकांत के शांत का,

वो पल हो तुम।

अकेले में गुनगुनाया,

वो नगमा हो तुम।

उदासी के मरू के अब्र की,

वो बूंद हो तुम।

कोई ओर नहीं हमसफर मेरे,

मेरा सब्र हो तुम।

– पथिक