सीखने सिखाने की कोशिश ( भाग- 15)

कबीर सोई पीर है,

जो जाने पर पीर।

जो पर पीर न जानही ,

सो काफिर बेपीर ।।

अब रोज याद आता है। याद तो उसकी हर पल की है, पर  अब वह मेरी अपनी असफलता के लिए बहुत याद आता है।

उसकी असफलता के लिए उसे ही  जिम्मेदार माना, कभी यह न सोचा कि असफलता उसकी नहीं, मेरे असफ़ल  अध्यापन  की थी।

         मेरा पहला छात्र – मुझ से छः साल छोटा- मां ने कहा, ” तू इसे पढ़ाया कर।” जब मां ने यह जिम्मेदारी मुझे दी, बहुत खुश हुई थी। पर जल्द ही जाना, यह  जिम्मेदारी, एक कठिन  साधना का कार्य है।

मैं अभी 16 वर्ष की हुई नहीं थी, वह भी दस वर्ष का नहीं हुआ था।पूरी जिम्मेदारी के साथ जब अपनी  किताबें ले कर बैठती, उसे भी अपने पास बिठाती थी। सोचा, छात्रा और अध्यापिका की भूमिका एक साथ निभ जाएगी।

पर मेरी गंभीरता और  उसकी चंचलता मेल ही नहीं खाती थी। जब कोई  विषय उसे समझाती, उसका दिमाग न जाने कहां फेरे लगा रहा होता था। कुछ याद करने को कहती , और थोड़ी देर में सुनती तो वहां गोल- मोल  होता, शायद उसने लिखे को पढ़ा ही नहीं होता था।

एक सवाल हल करने का तरीका समझाती, सोचती, इसे समझ आना चाहिए,  इसमें क्या कठिनाई है? पर देख न पाती, वह तो सुन ही न रहा होता था, न जाने क्या, गुन रहा होता था।

कुछ लिखने को कहती तो ऐसे लिखता, जैसे कंधे पर कोई बोझ लदा था, दिमाग और हाथ उस बोझ तले दबे थे कि जैसे-तैसे लिखकर बोझ पटक दिया गया हो।

मैं मां से कहती,” यह तो कुछ पढ़ता- समझता नहीं है।”

मां कहती, ” कोई  नहीं तू कोशिश कर, तेरे में धीरज है, तेरे से पढ़ लेगा।”

लेकिन मेरा धीरज उसके दिमाग के घोङे तक पहुंच नहीं पा रहा था।

मां कहती, ” दिमाग तो इसका बहुत तेज है।”

हां, इसमें कोई संदेह नहीं कि उसका  दिमाग तीव्र था, समझ, अनुभूति में उसके बराबर  हममें से कोई भाई- बहन नहीं था।

यह समझ नहीं आता, जिसका मन पढ़ाई से उचट गया है। जो स्वभाव से चंचल है, मन और दिमाग सिर्फ उड़ाने भरता है, उसे कैसे पढ़ाया जाए!

न ही समझने की कोशिश करी, सिर्फ दोष दिया तो उसे ही दिया।

अंतत: ट्यूशन अध्यापकों के जिम्मे उसे छोङ,  हम सभी बड़ों ने अपनी जिम्मेदारी पूर्ण कर दी  थी।

मां ने कभी नहीं कहा कि मैं पढ़ाती रहती तो अच्छा होता। पर उनके मन में था। एक बार कहा भी था शायद,  ” तू नहीं पढ़ाती उसे?”

मेरी पढ़ाई,  मेरी मस्ती, मेरी दुनिया और मेरी जिंदगी……… वह इनमें नहीं था।

क्यों नहीं था? आज सिर्फ पछतावा और रिसता दर्द है।

वह चला गया, चालीस वर्ष बीत गए। अपनी असफलता के मापदंड को नहीं माप सकी हूं। कुछ असफलताओं का कोई तराजू नहीं होता है।

वह गया, तब मेरी गोदी में था, मेरा पहला  पुत्र ( पहली संतान)।

एक भय मन में छाया रहा कि बच्चे पढ़ाई के कारण चले जाते हैं। एक बार तो विद्रोह करता कि ‘नहीं पढ़ना कुछ और करना है।’

अध्यापिका की भूमिका बहुत कठिन है, अपने छात्र- छात्राओं को मात्र ज्ञान नहीं देना है, उनके मन को पहले जानना और समझना है।

पिछले 35 वर्ष  से अध्यापन में सलंग हूं। बच्चों के मन को समझने की कोशिश निरंतर जारी है।। वे ही सब बांट रही हूं।

जब मन किसी का जान लो,

जब दर्द किसी का समझ लो,

तब मज़ाक उसका न उङा,

हाथ पकङ उसका,

उसके साथ चल- साथ चल।

क्रमश:

सीखने सिखाने की कोशिश  ( भाग- 14)

मन के हारे हार  है, मन के जीते जीत

कहै कबीर  हरि पाइए,  मन ही की परतीति ।।

पायल, हिमांशु और मानव  यह  तीनों भाई-बहन आज भी मुझे सम्मान देते हैं। हिमांशु को उस दिन देखकर मन खुशी से भर उठा था। उसकी मां से उसके पग – पग पर बढ़ते कदमों की खबर मिलती रही थी। आत्मविश्वास से परिपूर्ण तो वह हमेशा था, पर संकोची था। मुंह से बोल नहीं फूटते थे। ऐसे बच्चों को पढ़ाने में कोई कठिनाई नहीं होती है। जिनका पढ़ने में मन हो और दिमाग भी तीव्र हो। अध्यापक की हर बात को ध्यान से सुने और मनन करे। ऐसे छात्र बिरले ही होते हैं।

उस दिन अपने चचेरे भतीजे को मेरे पास लेकर एक अभिभावक के तौर पर बात करने आया था। अब इंजीनियर है, एक उच्च पद पर कार्यरत है।

मानव हिमांशु से आठ साल छोटा था। मेरे पास आरंभ से ही पढ़ने आता था। दिमाग का तीव्र होते हुए भी अपने भाई से विपरीत था। संकोच तो उसे छू भी नहीं गया था। मेरे पर  अपना पूर्ण अधिकार समझता था । मेरा भी वह विशेष छात्र था। आज ग्रेजुएट हो गया है।

‘पायल’ हिमांशु और मानव की बड़ी बहन, एक बहुत प्यार देने वाली छात्रा रही है। मैंने नहीं सिखाया उसे, सच कहूं तो मैंने ही उससे सीखा है। उसे बचपन से दौरे पड़ते थे, जिससे उसका दिमाग  कमजोर हो गया था। आज भी स्वस्थ रहने के लिए उसे दवाईयां लेनी पड़ती हैं।

अपनी स्थिति और संघर्ष को उसने स्वीकार किया और आगे  बढ़ती गई है। उसने बी.एड किया और जे.बी.टी करके एक विद्यालय में अध्यापिका के रूप में कार्यरत है।

जब मैं उसे आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती तो मानों मैं अपने  को प्रोत्साहित करती थी। उसके हौंसले, मेरे हौंसले बढ़ाते थे।

उसमें जो पढ़ने और आगे बढ़ने का जज़्बा  है, वह सामान्य व्यक्तियों में नहीं पाया जाता है। आज भी वह अक्सर मुझ से विभिन्न समस्याओं पर सलाह लेती है। उसकी मानसिक और शारीरिक कमजोरी का लोग मज़ाक  उठाते हैं। पर वह हार नहीं मानती है।

अपने इन छात्र- छात्राओं से प्रेरणा प्राप्त करते हुए ही, मैं सीखने की नई डगर पर बढ़ी, जिन कोर्सो को करने की मन में इच्छा रही थी, वे सब करते हुए फिर विद्यार्थी जीवन को जिया।।

ज्ञान तो कहीं से भी ग्रहण किया जा सकता है। मेरे जीवन में दो नन्हें फूल खिले, मेरे पोता-पोती, मैं हर दिन उनसे कुछ नया सीखती हूं। जो ज्ञान बच्चे अपनी मासूमियत  से हमें देते हैं, वह किताबों से प्राप्त नहीं हो सकता है।

‘बदलते जीवन को देखते हैं हम,

आओ कुछ नया सीखते हैं हम।’

क्रमशः

सीखने सिखाने की कोशिश ( भाग-13)

         ” एकै साधे सब सधै, सब साधै सब जाय।”

         ‘ रहिमन’ मूलहिं सींचिबो, फूलैफलै अघाय।।”

एक लंबे समय के बाद  ‘ सीखने सिखाने की कोशिश ‘ की यात्रा को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रही हूं।

मेरे शिक्षा मंदिर में यशमीत आया उसके पीछे अद्वितीय और  रेयान,  परी आदि आ रहे हैं। उनके आने से मेरी भक्ति भावना जग रही है और सीखने की ललक दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।

पर इतने दिन मैं क्या करती रही, इस पर चर्चा करने से पहले अपने उन पूर्व छात्र -छात्राओं का जिक्र  करना  चाहूंगी, जो अब इस देश के जिम्मेदार वयस्क   नागरिक  है। मैं तो उनका बचपन याद  कर रही हूं और वे अपनी संतानों के बचपन और परवरिश मे डूबे हुए हैं। वे जो आज भी मुझ से मिलकर  प्रसन्न होते हैं, उन्हें देख मेरी आंखें, मेरा मन तृप्त होता है।

मेरी छात्रा ‘मेघा’, उसकी बात अपने पूर्व अध्याय में अवश्य की होगी।  मेघा और उसके भाई लव और कुश।

लव का बेटा मेरे पोते की आयु का ही है। और कुश जिसका विवाह पिछले ही महीने संपन्न हुआ है। मैं आंमत्रित थी, उसे आशीर्वाद देते हुए,  वह नन्हा शर्मीला कुश ही आंखों के सामने घूम गया, जब पहली बार  मेरे पास आया था। उसकी चंचलता , प्यारी बातें, उसे नहीं, मुझे याद आती हैं।

ऐसा लगता है कि किसी के साथ पिछले जन्म का रिश्ता होता है, तभी उनसे इस जन्म में इतना प्यार व सम्मान  मिलता है। ‘मेघा’ उन्हीं में से एक है। अब वह अमृतसर  में रहती है, उसके साथ मेरा संपर्क, मेरी नहीं, उसकी कोशिश से बना हुआ है। वह अपना जीवन,  संघर्ष  और अपने बच्चों की परवरिश  आदि  अपने मन के साथ मुझे बांटती है।

मेघा तब आठवीं कक्षा में पढ़ती थी।  उन दिनों मैं एक छोटा नर्सरी स्कूल चलाती थी। कुछ सालों में मेघा इतनी शिक्षित हो गई  थी कि वह मेरे स्कूल में मेरी सहयोगी अध्यापिका के तौर पर काम करने लगी थी। हमारा संबंध गुरू शिष्या से अधिक ही पहले था और आज भी कायम है।

                             आज बीता जीवन समझने चली,

                             जो सीखा, उसे फिर पढ़ने चली,

                             सीखे ज्ञान में नए अर्थ खोजने चली।

क्रमश:

                

यह मन ही तो है

(1)

मन क्या कहता है?
कोई कैसे जाने? कैसे समझे?
मन की बात मन ही जाने,
हम तो बस जीवन को पहचाने,
कल जो मेरा मन था, आज वह बदल गया है।
उसकी भटकन, है याद मुझे।
उसकी अस्थिरता की, है पहचान मुझे,
पर आज वह बदल गया है।
उसकी चाहते अब बदल गई  हैं।
मेरा मन अब बदल गया है।
अब वह थम गया है,
अब नहीं वह भटका करता,
नई चाहते नहीं पैदा करता,
नई यादें नहीं संजोया करता,
पुरानी यादों में नहीं उलझा करता,
मन की बात मन ही जाने,
हम तो बस जीवन को पहचाने।

(2)

जीवन में कभी उदासियों आती हैं,
तो क्या आने दो,
कभी मन को उसमें बह जाने दो।
जब जानते हैं, कुछ भी स्थायी नहीं,
तो इसे भी स्वीकार करो,
यह भी बदल जाएगा।
परिवर्तन के लिए तैयार होते हुए भी,
चूंकि वे अप्रत्याशित होते हैं।
कई  बार वे उदासी लाते हैं।
चलो, अगले परिवर्तन की राह देखते हैं।





(3)

बहुत विनम्रता से यह सवाल करती हूं,
जो छूट गया, उसे पाना नहीं चाहती,
जो खो गया, उसे तलाशना नहीं चाहती।
फिर भी विनम्रतापूर्वक जानना चाहती?
आज को तुम्हारे साथ जीने की इच्छा को,
सिर्फ चाह भर के दायरे में ही रखती, क्यों ?


(4)

तारों की छांव में निकले थे, खुशियां तलाशने,
मालूम न था, अमावस पङ जाएगी।
चंदा का कुछ पता न था, किस नगरी में आज उसका बसेरा था।
मेरी आंखों के सामने तो अंधेरा था।
चंद्रमा की रोशनी बिना, तारे मुंह छिपाए थे।
क्या अंधेरे में हम ठोकर खाएंगे?
मंजिल तो पानी ही है,
चाहे ठोकर ही क्यों न खाएं!
कुछ देर थम कर, आंखों की रोशनी और
मन की ताकत को साथ बांधकर,
एक- दूसरे का हाथ पकङ,
हम चल पङे खुशियों की तलाश में।

पुत्री का पत्र पिता के नाम-10

अब तो आप और भी निश्चित हो गए  थे, जैसे मेरे जीवन में सब ठीक हो गया था। मैं अपने दो छोटे बच्चों को छोङ कर पढ़ने गई  थी, अपने पति और सास की सहमति के साथ।  आप सबके अनुसार ऐसे पति और सास बिरले ही देखने को मिलते हैं।

लेकिन मेरे प्रशांत  से अलग  होने के फैसले पर आपने कहा था,” क्या अलग होना जरूरी है?, बच्चों का सोच , उन पर कैसा प्रभाव पडेगा? अपने मन का कर तो रही है, आत्मनिर्भर है। प्रशांत में भी बदलाव दिखता है।”

बी.एड. के बाद,  मुझे एक अच्छे विद्यालय में नौकरी मिल गई थी, कुछ दिन बाद सरकारी नौकरी भी लग गई थी। आगरा से लौटते ही मैंने प्रशांत से अलग रहना शुरू कर दिया था। मैंने तलाक की कोशिश नहीं की थी। एक बार आगरा में अपनी एक सहेली के जान-पहचान के वकील से मिली थी। उस वकील से मिलने के बाद,  वकीलों की ओर से मन खट्टा हो गया था। तलाक मांगने वाली स्त्रियों को  आज भी सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता है। हिंदू कानून भी पहले समझौते की ही कोशिश करते हैं। शायद ठीक भी है। पर मेरे ख्याल से जहां प्रेम उत्पन्न ही न हुआ हो, एक- दूसरे के प्रति सम्मान भी मृतप्रायः हो, वहां साथ  रहना, सिर्फ एक मजबूरी है। तलाक के बाद  बच्चों को साथ नहीं रख पाती, चूंकि प्रशांत आर्थिक दृष्टि से अधिक संपन्न थे।

यूं बच्चें अपने पिता और दादी से दूर नहीं थे, प्रशांत उनकी जरूरतों का ध्यान रखते थे, बच्चों को अपने पिता और दादी का सानिध्य मिलता रहा था। फिर प्रशांत स्वयं तलाक का प्रस्ताव लेकर आए।  वह दूसरा विवाह करना चाहते थे। हमें आपसी समझ के आधार पर तलाक  मिल गया था।

उस दिन  भैया का फोन आया था, आपकी तबियत  खराब थी, दौड़ती हुई,  अस्पताल पहुंची थी। आपके पलंग के पास बैठी थी, धीरे से आपके हाथ पर अपना हाथ रखा, आपने ऑंख खोली और मुझे  इशारा किया कि सब ठीक  है। मैंने महसूस किया कि आपने कभी मेरा साथ नहीं छोङा था। मेरी नाराजगी घुलने लगी, अश्रु बहने लगे।

भैया ने बताया कि बिमारी अंतिम चरण पर है। सिर्फ हमारे पास छः महीने हैं। हां, हमारे पास! आप तो अपनी अगली यात्रा पर चल दोगे। पीछे हम सब….

घर लौटी और साथ लौटा यादों का बवंडर,  आप और मैं, मेरा बचपन और हमारी खुशी। धीरे- धीरे स्वीकार किया कि अब सिर्फ यादें होंगी। यादें जिनमें मैंने आप के प्रति, कितनी शिकायतें, नाराज़गी और गुस्सा भर रखा था। आप भी मुझ से बहुत नाराज थें। जब प्रशांत की दूसरी शादी की सूचना मिली थी, आपने गुस्से में कहा,’ इस लङकी ने अपने पांव पर कुल्हाड़ी मार ली है।’

जब-जब अपनी एकल मां की भूमिका में कठिनाईयों से जूझती होती, आप मुझ पर चिढ़चिढ़ा रहे होते, और चूंकि मैं आप से किसी प्रकार की मदद  की गुहार भी न करती तब मानों आप मुझ पर बरस रहे होते। फिर  यह मानते हुए  कि मैंने अपने लिए एक कठिन रास्ता चुना है, गर्व से कहते कि ‘ मेरी बेटी स्वाभिमानी है।’ मेरे इस संघर्ष में आप मेरे प्रेरक और मार्गदर्शक  थे।

और फिर यादों को सही क्रम देते हुए  जब उनसे गुजरने लगी, तब अनुभूति हुई कि आप जा रहे हैं और मुझे आपसे अभी बहुत कुछ  कहना है, आपको अपने विषय में कितना कुछ बताना है। माना कि आप बिना कहे मुझे जानते हो। पर जैसे स्कूल से लौट कर आपकी गोदी में बैठकर ढेरों बातें बताती थी।

और फैसला किया अपना जीवन जैसा बिताया, वह आपको बताऊं। पर अब मैं वैसी बच्ची नहीं रही न! इसलिए पत्र लिखने का फैसला किया। प्रतिदिन आपके पास जाती, आपके पास बैठी रहती, आप बहुत खुश होते, मेरा इंतजार देखते। घर आकर  पत्र लिखती।

आपको गए  वर्षो हो गए हैं, मां भी नहीं है। शायद मेरे पास भी अधिक वर्ष नहीं हैं। इस आयु में नया कुछ याद रहता नहीं है और पुराना साथ चलता रहता है। यादों के पुलिंदों में इस पत्र को रख कर कहीं भूल गई थी। आपको नहीं पढ़ाया था। कैसे पढ़ाती!

आपने भी धोखा दिया था, जाने की जल्दी थी। आपके आशीर्वाद से मिनी और बंटी ने न केवल अच्छे मुकाम को पाया है, अपितु पारंपरिक होते हुए भी उन सभी परंपराओं से अलग हटकर चलने का साहस करते हैं जो समाज की प्रगति में बाधक हैं। और मैं? अपने पोता- पोती, नाती- नातिन को आपसे सीखी हुई कहानियां सुनाती हूं। ज्ञान की परंपरा तो आगे बढ़नी है न!

आपकी लाडो

पुत्री का पत्र पिता के नाम -9

मैं शिक्षित तो थी, पर अच्छी नौकरी करने के लिए,  मेरी शिक्षा अधूरी थी। मैंने बी. एड, करने का फैसला किया। और मुझे आगरा विश्वविद्यालय में प्रवेश  मिल गया था, जिसकी ख़बर मैंने किसी को नहीं दी थी।

जाने का दिन आ रहा था। बच्चों को छोड़कर मुझे जाना था। दिल पक्का करके निकलना ही था।मैंने सही या गलत  का नहीं सोचा, सिर्फ एक ही लगन थी कि आगे बढ़ना है, अपने बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए अवांछित परंपराओं की बाधाओं को तोड़ना है। अपनी मदद स्वयं करनी थी।

प्रशांत  को बताने से पहले सासु मां को बताया था, क्योंकि उन्हें ही यह अहसास दिलाना आवश्यक था कि उन्होंने अपने अस्तित्व और  आत्मसम्मान को आज तक कितनी हानि पहुंचाई है।

जो जालिम है, वह सबके लिए  जालिम होता है। प्रशांत के गुस्से के शिकार सिर्फ मैं, बच्चें और नौकर ही नहीं थे, उनकी मां भी थीं। जिनके लिए उनका बेटा आज भी बच्चा था, जो दिल का अच्छा था, केवल क्रोधी ही था। मैं मां और बेटे के बीच में आना भी नहीं चाहती थी, लेकिन मां की ममता में बंद आंखों के पीछे छिपी  औरत का अक्स उन्हें देखना था।

मैं जानती थी कि वह अपने पति के अत्याचारों से पीड़ित रही हैं , फिर भी पति की सेवा ही उनका जीवन था। उस दुख और कष्ट  में उनका पुत्र ही उनका सहारा रहा था। पुत्र पर निर्भरता ने उनको अपने पुत्र के सामने आत्महीन बना दिया था। वह ही पुत्र जिसने बेशक अवचेतन रूप से, पिता को ही अपना आदर्श माना था।

जब  मैंने उन्हें एक वर्ष के लिए अपने आगरा जाने के फैसले के बारें में बताया था, तब वह न केवल नाराज हुई अपितु हैरान भी थीं। कैसे एक औरत पति को बिना बताए, पति की इच्छा के विरूध्द,  सिर्फ शिक्षा के लिए  , अपने बच्चों को छोड़कर जा सकती है।

मैंने उन्हें कहा कि उन्होंने न  केवल अपने पति के अत्याचार को अपना धर्म  समझा, बल्कि उन्होने पुत्र के आतंक को भी अपने जीवन का सच बना रखा है।

मैंने उन्हें स्पष्ट रूप से कहा कि पति का अत्याचार कभी मेरा धर्म  नहीं बन सकता है और न मैं अपने पुत्र को आतंकी बनने दूंगी। वह  गुस्से में रहीं थी, पर उन्होंने मेरे जाने में कोई रूकावट भी पैदा नहीं की थी। वह नए युग  के इस बदलाव  से हतप्रभ थीं, पर मौन सहमति के साथ।

अब प्रशांत को बताना था। मैं अपने फैसले पर दृढ़ थी, उसके आरोपों और प्रत्यारोपों व किसी भी अनुचित व्यवहार का सामना करने की तैयारी कर रही थी। कुछ भी अप्रत्याशित न होते हुए भी अप्रत्याशित घट गया था। उम्मीद के अनुसार प्रशांत बहुत चिल्ला रहे थे और मैं उनसे न उलझकर, चुपचाप तूफ़ान के गुजरने की प्रतीक्षा कर रही थी।

कहते तो यही है कि  एक की चुप्पी दूसरे के गुस्से पर पानी का काम करती है। पर इस बार ऐसा नहीं हुआ,  मेरी चुप ने प्रशांत के गुस्से पर घी डाल दिया था।  उस दिन बङे दिनों बाद प्रशांत ने मेरे ऊपर हाथ उठाया, और मैंने न जाने कैसे उस पर पलटवार किया। मैं घबरा गई कि  आपसे मेरी शिकायत की जाएगी। मैं स्वयं अपने पर हैरान व शर्मिंदा थी। मेरे संस्कार, हमारी परंपराएं, मुझे कटघरे में खङा कर रही थीं।

लेकिन प्रशांत ने इस विषय में किसी से कुछ नहीं कहा, क्यों? मैंने स्वयं आप सबको आगरा जाकर पढ़ाई  करने के विषय में बताया था। आप बहुत खुश हुए और मेरे जाने से पहले मां के साथ घर आए थे। सासु मां और प्रशांत दोनों ने ही आपसे मेरी कोई शिकायत नहीं करी। अपितु ऐसा ही प्रतीत हो रहा था, जैसे मेरी इस राह के वे ही मार्गदर्शक हैं। यूं व्यक्तिगत रूप से हमारे बीच कटुता पसरी हुई थी। शायद सम्मानित, पारंपारिक और अहंकारी व्यक्ति ऐसे ही होते हैं।

क्रमशः

पुत्री का पत्र पिता के नाम- 8

बाहरी दुनिया ने मेरे जीवन के रास्ते खोल दिए।  इस दुनिया को लेकर  जो भय थे, वे दूर होने लगे। घर-बाहर को संभालना मेरे लक्ष्य को पाने का एक महत्वपूर्ण कर्म था। अपनी आत्मस्वतंत्रता के लिए,  यह मेहनत मुझे सुख दे रही थी।  संघर्ष और मेहनत से कैसा डर?

क्यों हम चाहते हैं कि हमारे घर की औरतें चहारदीवारी में सुरक्षित  रहे। घर में सुरक्षा? घर में रहते हुए क्या चरित्र हनन नहीं होता है? बाहर तो आप सावधानी बरतते हुए, संभल पाते हैं। घर की दीवारों से आप कैसे बाहर निकलेंगे?  हर जगह में हर तरह के लोग होते हैं, अच्छे भी और बुरे भी।  घर भी ऐसी जगह है।

दुर्घटनाएं सङक पर ही नहीं होती घर पर भी होती हैं। फिर बाहर निकलने पर भय क्यों?  बाहर फिर भी मदद मिल जाती है। कानून और पुलिस और शायद भले लोग भी हैं।  प्रत्येक घर की अपनी दीवारें है, दायरे हैं, कोई  किसी के व्यक्तिगत मामलों में दखल नहीं दे सकता है।

घर के बाहर क्यों कोई  अनावश्यक समझौते करे? लेकिन घर पर तो समझौते करने ही है।  मां, कहती थीं, सिर्फ किताबी ज्ञान से दुनिया को नहीं समझा जा सकता है, व्यावहारिक समझ भी आवश्यक है।  मां जानती थीं कि मुझे आप दोनों की छत्रछाया से निकलना है। अजनबियों के साथ कुछ घंटे बिताने नहीं जाना है, पूरा जीवन बिताने जाना है। एक घर को अपना घर कहने बनाने के लिए  अपनी आत्मा को कितनी बार मरते देखना पङता है।

आप कहते कि ‘मेरी बेटी ऐसे घर जाएगी, जहां राज करेगी।’ नहीं, माफ़ी चाहती हूं। मैं आपसे नाराज़ नही हूं ।  पर आपने बाहर की दुनिया को जाना, इसलिए आप मुझे उससे दूर रखना चाहते थे।  फिर मेरा प्रश्न, क्यों?  अधर्म को जाने बिना उसे पहचानेंगे कैसे? उससे लङेंगें कैसे !  धर्म की जीत कैसे होगी?  कबूतर के आँख बंद करने से बिल्ली झपटा नहीं मारेगी क्या?  कबूतर कमज़ोर नही है, सिर्फ डर गया है, उसके पास उङने  की ताकत है, तीखी चोंच भी है। अपनी ताकत पहचाननी जरूरी है।

अधर्म जो आपको बाहर नज़र आया वह घर में घुसा हुआ है।  आपको नज़र नहीं आया?  या नज़रअंदाज किया हुआ है?  पर मां जानती है, उसे पहचानती है, वह घर में रहती हैं, उन्होंने भोगा है। नहीं, मैं आपको अधर्मी नहीं कह रही हूं, आप एक उदार व्यक्ति हैं।

मां ने जो जाना- समझा वही ज्ञान दिया।  मां ने करोड़ों  वर्षो से जो औरतों की कोशिशों को विफल होते देखा  उस आधार पर मुझे चुप रहने की सीख दी। उन्होंने  पिंजरे में बंद चिङिया की चीं-चीं  सुनी, जो  बिल्ली से बचने के लिए  उङ नहीं सकी।  वह पिंजरे से बाहर भी होती तो वह उङ नहीं सकती थी, उसके पंख काट दिए  गए थे। पर पिंजरे के बाहर  होती तो शायद बचने का कोई  उपाय कर पाती।

इसलिए उन्होंने कहा,” चुप रहो, धैर्य रखो और सहन करो।” लेकिन क्या, जो सब्र रखती और सहन करती रहती हैं, क्या वे टूटती नहीं रहती है, बिखरती नहीं रहती हैं?

और जिनकी सहनशक्ति टूट जाती है, वे हिम्मत हार जाती हैं, फिर  जो वह करती हैं, उसमें सिर्फ  दुःख होता है, शायद पछतावा भी होता है।  वह अपने पीछे  न जाने कितने सवाल  छोङ जाती हैं। पर क्या लाभ? विद्वान कहते हैं कि अत्याचार सहने वाला , अत्याचारी के समान गुनहगार है। परंतु अत्याचारी के विरूद्ध  लङने के लिए भी ताकत और कौशल चाहिए।

बाहर निकली तो जाना, समय बदल रहा है, अब आत्महीनता में जीना गलत माना जाता है। अपने अधिकार के लिए  बोलना, अपने अस्तित्व के लिए दृढ़तापूर्वक  गलत का सामना करना गर्व की बात समझी जाती है।  अब मैं उन औरतों की आलोचक नहीं थी जिन्होंने  मुझे चुप रहने की सलाह दी थी और सहने की परंपरा को आगे बढ़ाया था।

मुझे आगे बढ़ना था। पर यह इतना भी आसान नहीं था। सिर्फ बाहरी अवरोधों से नहीं, अपने अंतर्द्वंद और संस्कारों से भी जूझना था।

क्रमशः

पुत्री का पत्र पिता के नाम-7

मैं घर आ गई,  उस घर, जो कभी मेरा  नहीं बना था। प्रशांत अपनी जीत पर खुश थे। मेरे पिता ने उन्हें यह अहसास दिला दिया था कि वह सामाजिक रूढ़ियों को अपनी लाडली से अधिक महत्व देते हैं। सासु मां मुझ पर मेरे मायके की शरण में जाने पर तंज कसती थीं। मुझे मेरे अपनों ने ही अकेला कर दिया था।

हां, अब मार-पीट नहीं होती थी। पर हिंसा के और भी कई माध्यम होते हैं । मैं प्रतिदिन अपमानित होती थी। जब बंटू पैदा हुआ तो प्रशांत गर्व से ऊंचे उठ गए कि जैसे घर में एक अन्य पुरुष उनकी परंपरा को मजबूत बनाने आ गया है। अब अपने बच्चों के सामने ही अपमानित होने से मेरी  आत्महीनता चरम सीमा में पहुंच  गई थी। मैं अपनी विवशता के लिए दूसरों को दोष दे रही थी। कहते है न! जब कष्ट की इंतहा हो जाती है तब  आशा की किरण दिखती है।

सावन का महिना था, मैं दो – चार दिन के लिए  अपने मायके आई थी। दोनों बच्चे मिनी और बंटू बहुत खुश थे। आप उन्हें कहानियां सुना रहे थे। और मैं वहां अपने को देख  रही थी। आपकी दी हुई शिक्षाएं, ज्ञान व दर्शन के पन्ने खुल रहे थे। तब मैंने जाना कि आपने जो ज्ञान का दीपक मेरे अंदर जलाया था, वह अभी बुझा नहीं था, टिमटिमा रहा था। वह दीपक मुझ से कह रहा था, ‘अब नहीं, बस और नहीं!

लौटते हुए आपने मेरे सिर पर हाथ  रखकर कहा ” तुम  हौसले वाली, शिक्षित और बुद्धिमान हो। अपने बच्चों का उचित मार्गदर्शन तुम्हारी ज़िम्मेदारी है।” मुझे लगा आप मुझे कह रहे हो कि मैं उन  वीरांगनाओं को याद करूं जिन्होंने हिम्मत से अपने जीवन की कठिनाईयों पर विजय  प्राप्त की थी। यह जीवन भी एक युद्धक्षेत्र है। अर्जुन ने भी धर्मयुद्ध लङा था। झांसी की रानी ने भी अपने अधिकार की लङाई लङी थी। और स्वाभिमानी सीता …. मुझे इस समाज में रहते हुए ही अपने अस्तित्व को संभालना था।

मैंने  अपने सोए हुए  स्वाभिमान को जगाना शुरू किया और फिर अपने आत्मविश्वास को प्राप्त करने के प्रयत्न में जुट गई थी। पर असली संघर्ष अब आरंभ हुआ था।

पहली बार मैं आपके विरूद्ध जा रही थी। आपने कहा था कि ‘ नौकरी मत करना, घर व बाहर संभालने  में औरत की गत बन जाती है।” लेकिन सिर्फ घर में रहने से तो मैं अपने को खो बैठी थी। रास्ता चलना भूल गई थी। मैंने जाना आर्थिक स्वावलंबन प्रत्येक इंसान के लिए आवश्यक है।

मेरे पास पैसा नहीं था, प्रशांत से मांगने का प्रश्न नहीं था। काश!  नौकरी करती होती तो यह आत्महीनता की समयावधि इतनी भी लंबी न होती। मेरा शरीर इतना कमजोर न होता और शायद तब इतनी अकेली न होती।

मुझे नौकरी करनी थी, ज़ीरो से आरम्भ करना था। नौकरी की बात सुनकर  घर में तूफान आना था और आया भी। पर अब मैं रूकने वाली नहीं थी। हां, अब भी मुझे धीरज रखना था, अपनी शक्ति को इस तूफान से जूझने में क्षय नहीं करना था। कहीं पढ़ा हुआ वाक्य याद आया, ‘ व्यर्थ के शोर में न फंसते हुए,  दृढ़तापूर्वक  अपने चुने हुए मार्ग पर बढ़ना चाहिए। ‘

  मैंने एक छोटे स्कूल में विज्ञान की अध्यापिका की नौकरी प्राप्त कर ली थी। वेतन कम था, पर मेरे आत्मविश्वास की नींव रखने के लिए पर्याप्त था। प्रशांत और सासु मां के विरोध के बावजूद मेरे पास गणित और विज्ञान पढ़ने  के लिए विद्यार्थी घर पर भी आने लगे थे। यह तो आरंभ था।

मैं देख रही थी कि मिनी ,दादी और पिता द्वारा बेटी – बेटे के भेद-भाव की शिकार हो रही है। उससे भी अधिक बंटू भी अंजाने ही लडकियों का सम्मान करना नहीं सीख रहा था। अपने बच्चों को सही-गलत परंपराओं का ज्ञान कराना मेरा कर्तव्य था। उसके लिए मुझे आत्मविश्वासी बनना था और अपने ही बच्चों का सम्मान प्राप्त करना था।

क्रमशः

पुत्री का पत्र पिता के नाम-6

अगले दिन मां का फोन आया था। पूछ रही थीं मेरा हाल, भैया-भाभी को मैं परेशान लगी थी, मैंने हंसते हुए , उन्हें समझा दिया था। आप से अब कम बात होती थी। आपकी फोन पर बात करने की आदत नहीं थी। मैं आपसे बात करने को तरसती थी, चाहती थी कि आपसे अब समाज की परंपराओं और दायरों पर बात करूं, इन विषयों पर तो आपने मुझ से कभी  चर्चा नहीं की थी। आपने क्या समझ लिया था कि मैं खुश हूँ? क्या मेरी हँसी  में मेरा दर्द नज़र नहीं आया था। या आप सब समझ रहे थे।  मां ने बताया था , कुछ समय बाद जब उन्हें मेरी तकलीफ़ का पता चला था कि ” तुम्हारे पापा तो शुरू से कहते थे , प्रशांत एक कठोर व्यक्ति हैं।”

पर आपने कभी मुझ से मेरा हाल नहीं पूछा। भैया तो कहा करते थे कि ‘कोई  कष्ट हो तो बेझिझक बताना, मैं हमेशा तेरे साथ हूँ। ” आपकी तरफ से कोई  आश्वासन नहीं मिला। इसका अर्थ यही था कि मैं अपनी लड़ाई स्वयं लङू।

फिर भी मैंने एक बार मिनी के होने के बाद आप सबको सब कुछ बताया था। मैं आपके पास आई थी, अपने जीवन को एक नया रूप  देने के लिए,  मैं स्वाभिमान और आत्मविश्वास का सफ़र  आरंभ करना चाहती थी। मैं समझती थी कि आपने मेरी उंगली थाम रखी है, इस नई डगर पर आपका भरोसा मेरे साथ होगा।

पर नहीं, तब जाना आपने मेरी उंगली छोङ दी है।  जैसे साईकिल  सिखाते समय आपने धीरे से पीछे से पकङी साईकिल छोङ दी थी। पर साईकिल चलाना तो आपने  सिखा दिया था।  जीवन में चलना भी सीखा दिया था क्या? मैं ही नहीं समझ पा रही थी।   क्योंकि जीवन की डगर सङक की राहों से अधिक कठिन थी।        

सभी कह रहे थे, मैं जल्दबाज़ी कर रही हूं।  घर की सभी औरतें यही कह रहीं थी कि मर्द तो ऐसे ही होते हैं। प्रत्येक अपनी सलाह दे रहा था कि ऐसे मर्दो के साथ कैसे निभाया जाता है।

नानी ने कहा कि मेरी सीख गांठ  में बांध  ले, ” गृहस्थी की नींव औरत की सहनशीलता पर रखी जाती है। यहीं तेरे धैर्य की परीक्षा है।”

मां ने कहा, ” मैं तो 99.5% चाहती हूं कि तेरी शादी न टूटे।”

आप नहीं बोले, कोई  सलाह नहीं दी। अपितु भैया ने जब केस करने की बात की, आपने उन्हें रोक दिया कि जल्दबाज़ी न करें।

फिर प्रशांत और सासु मां आए और भविष्य के सुंदर सपने दिखा कर मुझे अपने साथ ले गए।  प्रशांत ने तो आपके सामने अपनी गलती स्वीकार करते हुए कहा कि वह अपने गुस्से पर काम कर रहे हैं, मनोवैज्ञानिक से सलाह ले रहे हैं।

मुझ से बोले ,” मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ,  तुम्हारे और मिनी के बिना नहीं रह सकता हूँ। ”

मैं चली गई,  सबने कहा कि सब ठीक हो जाएगा। जबकि सभी अनुभवी लोग जानते थे कि कुछ ठीक नहीं होगा।

मां ने कहा ” मर्द गुस्से में हो तो बहस नहीं करते, तेरी सास ने बताया कि तू भी प्रशांत से उलझती है।” ऐसा लगा जैसे सास से मेरी शिकायत सुनकर वह शर्मिंदा हैं।

मैं सोच रही थी कि सहनशीलता की नींव पर या स्वाभिमान को खत्म करके गृहस्थी बनती है। और बचे 5% में  क्या जीवन बचेगा?

पर मेरी बात कौन सुनना चाहता था! आप? सिर्फ अपने दामाद की मिजाज़पूर्सी में लगे थे, जैसे अपनी बेटी उन्हें दे कर  उनसे कर्ज ले लिया था।

मैं सदियों से चली आ रही परंपरा को आगे बढ़ाने चली गई। भविष्य में भी कभी आपने नहीं जानना चाहा, मैं कैसी हूं।  आप जो मेरी ढाल होते थे। क्यों? क्या तकलीफ अहसासहीन हो गई थी, या समाज का भय इस तकलीफ से ज्यादा था अथवा बाहरी दुनिया का खौफ अधिक गहरा पैठा था?

क्रमशः

पुत्री का पत्र पिता के नाम-5

मैं स्तब्ध पलंग पर  बैठी थी, सासू मां मेरे पास बैठी, मेरा सिर सहला रही थीं। बोली, ” सब भूल जाओ, अब अपने स्वास्थ्य पर ध्यान दो, एक सुंदर स्वस्थ पोता देना है, तुमने मुझे।”  फिर प्रशांत से बोली, ” चल इसे सूप पिला, कोई  बेकार की बात मत करना, इसको कोई  मानसिक तनाव नहीं देना है, इसका खुश रहना बहुत  जरूरी है।” मेरा मन नहीं था कि प्रशांत मेरे करीब बैंठे। पर सासू मां के सामने कुछ न बोल कर  सूप का कटोरा दामिनी (नौकरानी) के  हाथ से लेकर  स्वयं ही पीने लगी।

अजनबी लोगों के बीच आकर भी  जो लोग अजनबी नहीं लगे थे, वहां अब सिर्फ अजनबियत ही छाई हुई थी। यह कमरा, इसकी दरो- दीवार,  यह बिस्तर जिस पर मुझे लगा था कि मेरे जीवन में भी प्रेम खिलने लगा है, अब प्रश्नचिन्ह बन गए थे। प्रशांत स्वयं मेरे पास  आए, बोले, ” अब कैसी हो?” मैने उनकी ओर  देखा, उनकी आंखों में क्रोध नहीं था, पर प्रेम भी… अब विश्वास  मेरे अंदर से गायब था, मैं सहज नहीं थी।

तभी सासू मां बोली, ” तुम कपडे बदलकर  तैयार हो जाना, तुम्हारे भाई-भाभी आ रहे हैं, तुम्हारी मां का फोन आया था, उन्हे भी यह खुशखबरी दे दी थी ।” फिर बोली,”घर की बात घर में ही रहनी चाहिए।  जीवन में कभी अनचाहा हो जाता है, अधिक सोचना नहीं चाहिए,  मैं हूं न ! सब ठीक है, वे लोग आएं, तो ध्यान रखना।”

अपने माता-पिता, भाई-भाभी, बाहर के लोग हैं? और  ये जो मेरे आसपास मौजूद हैं,  इन्हें अपना समझूं ? मैंने आंसू पी लिए। 

भाभी आईं, मेरे चेहरे की उदासीनता को पढ़ गईं। भैय्या ने कहा,  ” क्या हुआ,  छोटी बच्ची बङी बनने जा रही है, तो घबरा रही है क्या?”

“शुरू -शुरू में ऐसा ही होता है, डाक्टर को दिखाया है, सब ठीक है। ” सासु मां बोली

मैं कोशिश कर रही थी कि कम बोलू, कि कहीं आंसू न छलक जाएं, अपने प्रियजनों से झूठ या नाटक करना नहीं  आता था। पर न जाने  यह विचार कैसे मन में आया कि अपने जीवन की लङाई स्वयं लङनी होगी। भैया ने कहा न! मैं बङी होने जा रही हूं।

रात को प्रशांत मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर बोले ,” एक बार मेरी तसल्ली के लिए  अपनी मां की कसम खा कर बताओ कि यह मेरा बच्चा है।” मैंने अपना हाथ खिंचते हुए कहा ,” कल तो आप मेरा संबंध विशाखा के साथ…”

वह तुरंत बोले, ” मेरी गलती थी, मेरे कल के व्यवहार को भूल जाओ। मैं तुम पर अभी भी शक नहीं कर रहा हूँ,  सिर्फ  मेरे लिए कसम खाकर बोल दो।”

मैं बहुत असमंजस में थी। प्रशांत बहुत निरीह दिख रहे थे।  मुझे  दया तो नहीं आई, पर कसम खा ली थी। उन्होंने मुझे गले लगाया और मैं सोच रही थी कि क्या सभी पुरुष ऐसे होते हैं,  मातृत्व का अपमान,  अजन्मे को गाली……. मेरी आंखों के सामने आप, भैया और वे सब जो मेरे आदर्श थे घूम गए और उनसे एक सवाल गूंजता  रहा  कि पुरुष का अहंकार इतना बङा होता है कि वह अपने ही प्रेम का अपमान करता है।

क्रमशः

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