कबीर सोई पीर है,
जो जाने पर पीर।
जो पर पीर न जानही ,
सो काफिर बेपीर ।।
अब रोज याद आता है। याद तो उसकी हर पल की है, पर अब वह मेरी अपनी असफलता के लिए बहुत याद आता है।
उसकी असफलता के लिए उसे ही जिम्मेदार माना, कभी यह न सोचा कि असफलता उसकी नहीं, मेरे असफ़ल अध्यापन की थी।
मेरा पहला छात्र – मुझ से छः साल छोटा- मां ने कहा, ” तू इसे पढ़ाया कर।” जब मां ने यह जिम्मेदारी मुझे दी, बहुत खुश हुई थी। पर जल्द ही जाना, यह जिम्मेदारी, एक कठिन साधना का कार्य है।
मैं अभी 16 वर्ष की हुई नहीं थी, वह भी दस वर्ष का नहीं हुआ था।पूरी जिम्मेदारी के साथ जब अपनी किताबें ले कर बैठती, उसे भी अपने पास बिठाती थी। सोचा, छात्रा और अध्यापिका की भूमिका एक साथ निभ जाएगी।
पर मेरी गंभीरता और उसकी चंचलता मेल ही नहीं खाती थी। जब कोई विषय उसे समझाती, उसका दिमाग न जाने कहां फेरे लगा रहा होता था। कुछ याद करने को कहती , और थोड़ी देर में सुनती तो वहां गोल- मोल होता, शायद उसने लिखे को पढ़ा ही नहीं होता था।
एक सवाल हल करने का तरीका समझाती, सोचती, इसे समझ आना चाहिए, इसमें क्या कठिनाई है? पर देख न पाती, वह तो सुन ही न रहा होता था, न जाने क्या, गुन रहा होता था।
कुछ लिखने को कहती तो ऐसे लिखता, जैसे कंधे पर कोई बोझ लदा था, दिमाग और हाथ उस बोझ तले दबे थे कि जैसे-तैसे लिखकर बोझ पटक दिया गया हो।
मैं मां से कहती,” यह तो कुछ पढ़ता- समझता नहीं है।”
मां कहती, ” कोई नहीं तू कोशिश कर, तेरे में धीरज है, तेरे से पढ़ लेगा।”
लेकिन मेरा धीरज उसके दिमाग के घोङे तक पहुंच नहीं पा रहा था।
मां कहती, ” दिमाग तो इसका बहुत तेज है।”
हां, इसमें कोई संदेह नहीं कि उसका दिमाग तीव्र था, समझ, अनुभूति में उसके बराबर हममें से कोई भाई- बहन नहीं था।
यह समझ नहीं आता, जिसका मन पढ़ाई से उचट गया है। जो स्वभाव से चंचल है, मन और दिमाग सिर्फ उड़ाने भरता है, उसे कैसे पढ़ाया जाए!
न ही समझने की कोशिश करी, सिर्फ दोष दिया तो उसे ही दिया।
अंतत: ट्यूशन अध्यापकों के जिम्मे उसे छोङ, हम सभी बड़ों ने अपनी जिम्मेदारी पूर्ण कर दी थी।
मां ने कभी नहीं कहा कि मैं पढ़ाती रहती तो अच्छा होता। पर उनके मन में था। एक बार कहा भी था शायद, ” तू नहीं पढ़ाती उसे?”
मेरी पढ़ाई, मेरी मस्ती, मेरी दुनिया और मेरी जिंदगी……… वह इनमें नहीं था।
क्यों नहीं था? आज सिर्फ पछतावा और रिसता दर्द है।
वह चला गया, चालीस वर्ष बीत गए। अपनी असफलता के मापदंड को नहीं माप सकी हूं। कुछ असफलताओं का कोई तराजू नहीं होता है।
वह गया, तब मेरी गोदी में था, मेरा पहला पुत्र ( पहली संतान)।
एक भय मन में छाया रहा कि बच्चे पढ़ाई के कारण चले जाते हैं। एक बार तो विद्रोह करता कि ‘नहीं पढ़ना कुछ और करना है।’
अध्यापिका की भूमिका बहुत कठिन है, अपने छात्र- छात्राओं को मात्र ज्ञान नहीं देना है, उनके मन को पहले जानना और समझना है।
पिछले 35 वर्ष से अध्यापन में सलंग हूं। बच्चों के मन को समझने की कोशिश निरंतर जारी है।। वे ही सब बांट रही हूं।
जब मन किसी का जान लो,
जब दर्द किसी का समझ लो,
तब मज़ाक उसका न उङा,
हाथ पकङ उसका,
उसके साथ चल- साथ चल।
क्रमश: