जिगर हमारा, फौलादी मिज़ाज रखता है,
आँखों से बहता सैलाब भी, बाँध रखता है !!
लगने नहीं देता चोट, पहला ग़म का बख्तर,
नये घाव के आगे, पुराने ज़ख्म याद रखता है !!
दे करके बेवफाई को, कोई मजबूरी का नाम,
बचा के बदनामी से, मुहिब्ब की लाज़ रखता है !!
हो जाता है शादाँ, जुगनू की रोशनी से भी,
देने तस्सली, घर में बुज़ा चराग रखता है !!
क़ायम है, मुहब्बत का वो जज्बा ऐसा की,
लाश बन कर भी साँसे बरक़रार रखता है !!
नीशीत जोशी (शादाँ=happy) 31.10.14





