कभी कभी तो बहुत याद आने लगते हो
कि रूठते हो कभी और मनाने लगते हो
गिला तो ये है तुम आते नहीं कभी लेकिन
जब आते भी हो तो फ़ौरन ही जाने लगते हो
ये बात 'जौन' तुम्हारी मज़ाक़ है कि नहीं
कि जो भी हो उसे तुम आज़माने लगते हो
~जौन एलिया
Professor
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परिवर्तको भव:,
Be a change!
Nationalist, Independent thinker!
Gurgaon, India
Born December 17
Joined November 2009
- कल दोपहर अजीब सी इक बे-दिली रही बस तीलियाँ जला के बुझाता रहा हूँ मैं जिस दिन से ए'तिमाद में आया तेरा शबाब उस दिन से तुझ पे ज़ुल्म ही ढाता रहा हूँ मैं इक सत्र भी कभी न लिखी मैं ने तेरे नाम पागल तुझी को याद भी आता रहा हूँ मैं ~जौन एलिया
- इक रंग सी कमान हो, ख़ुश्बू सा एक तीर मरहम सी वारदात हो और ज़ख़्म खाऊँ मैं तुझ से गिले करूँ, तुझे जानाँ मनाऊँ मैं इक बार अपने-आप में आऊँ, तो आऊँ मैं दिल से सितम की बे-सर-ओ-कारी हवा को है वो गर्द उड़ रही है कि ख़ुद को गँवाऊँ मैं ~जौन एलिया
- Fail to understand a new Drama, someone is believing him as God too.लालू वाला खेल चल रहा है। पत्नी को आगे किया, अब मेडिकल कारणों से बेल के लिए अप्लाय करेगा।
- शर्म दहशत झिझक परेशानी नाज़ से काम क्यूँ नहीं लेतीं आप वो जी मगर ये सब क्या है तुम मेरा नाम क्यूँ नहीं लेतीं ~जौन एलिया
- Prayers for speedy recovery, we know you are fine and nothing can deviate you from Pro Bono Publico. 🙏An Update from Sadhguru...
00:00 - दिल को तेरी चाहत पर भरोसा भी बहुत है और तुझसे बिछड़ जाने का डर भी नहीं जाता
- तुम गुलिस्ताँ से गए हो तो गुलिस्ताँ चुप है शाख़-ए-गुल खोई हुई मुर्ग़-ए-ख़ुश-इल्हाँ चुप है और आगे न बढ़ा क़िस्सा-ए-दिल क़िस्सा-ए-ग़म धड़कनें चुप हैं सरिश्क-ए-सर-ए-मिज़्गाँ चुप है न किसी आह की आवाज़ न ज़ंजीर का शोर आज क्या हो गया ज़िंदाँ में कि ज़िंदाँ चुप है ~मख़दूम मुहिउद्दीन
- अब कर के फ़रामोश तो नाशाद करोगे पर हम जो न होंगे तो बहुत याद करोगे ~मीर तक़ी मीर
- My Iron man is none other but my helping hand to iron clothes. #ironman
- ज़िक्र भी उस से क्या भला मेरा उस से रिश्ता ही क्या रहा मेरा आज मुझ को बहुत बुरा कह कर आप ने नाम तो लिया मेरा आख़िरी बात तुम से कहना है याद रखना न तुम कहा मेरा अब तो कुछ भी नहीं हूँ मैं वैसे कभी वो भी था मुब्तला मेरा ~जौन एलिया
- एक ही ख़्वाब ने सारी रात जगाया है मैं ने हर करवट सोने की कोशिश की कितनी लम्बी ख़ामोशी से गुज़रा हूँ उन से कितना कुछ कहने की कोशिश की कल फिर चाँद का ख़ंजर घोंप के सीने में रात ने मेरी जान लेने की कोशिश की ~गुलज़ार
- हम जी रहे हैं कोई बहाना किए बग़ैर उस के बग़ैर उस की तमन्ना किए बग़ैर मैं बिस्तर-ए-ख़याल पे लेटा हूँ उस के पास सुब्ह-ए-अज़ल से कोई तक़ाज़ा किए बग़ैर उस का है जो भी कुछ, है मेरा और मैं मगर वो मुझ को चाहिए कोई सौदा किए बग़ैर ~जौन एलिया





