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हे परम प्रियतम पूर्णतम पुरषोत्तम श्री कृष्ण।
तुम से विमुख होने के कारण अनादिकाल से
हमनें , हमने अनन्तानन्त दुख पाये एवं पा रहे हैं। पाप करते करते अन्त: करण इतना मलिन हो चुका कि रसिकों द्वारा यह जानने पर भी, की तुम अपनी भुजाओं को अपनी वात्सलल्यमयी दृष्टी से मेरी प्रतीक्षा



