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जब कर्तव्य के सम्मुख स्वजन खड़े हों, तब निर्णय केवल बुद्धि का नहीं, अंतःकरण का भी विषय बन जाता है।
सीज़न 1, एपिसोड 2 में हम अर्जुन के "स्वजन" के भाव को समझते हैं: वह क्षण जब स्नेह और धर्म के बीच संतुलन साधना सबसे कठिन प्रतीत होता है।
एक प्रश्न मन में उठने दीजिए: क्या मेरा विवेक
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