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जिल्ले इलाही और बाजपेई बरहमन
नदीम हसनैन साहब ने एक दिन कहा- यार तुम बाजपेईयों पर क्यों नहीं लिखते।खालिस लखनऊआ लोग हैं। नवाबों से भी पुराने। काम ही नहीं हुआ उन पर। मैंने फरमाया कहीं- यह कास्ट को ग्लोरिफाई करने जैसा ना हो जाए। जो लखनऊआ की रूह के खिलाफ है।
कहने लगे मैं



