तरुणाई जब मंत्र फूँक,चौसर पर पासा फेंकेगी
भीष्म सी बुद्धि कोने मे चुपचाप तमाशा देखेगी
वासना प्रेम का रण होगा,भावों का चीरहरण होगा
सब ज्ञान बनेगा गांधारी,कुछ केश खुलेंगे प्रण होगा
जब तक विवेक सारथी बनेगा,लाक्षागृह जल जाएगा
मन तो शकुनि मामा है,छलता है,छल जाएगा
◆शंकर
#जिल्दसाज़ी
अम्मा बहुत परेशान थीं
कई दिनों से दिमाग ठीक नहीं था,
लोग पागल समझते थे
यहाँ तक कि घरवाले भी अब तंग आ चुके थे
अम्मा की देखभाल उनके वश की नहीं थी
आये दिन कपड़े गंदे हो जाना आम बात थी
अम्मा ख़ुद हीं शर्मिंदा हो जातीं
सुबह के 3 बज रहे थे
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:/शंकर
#जिल्दसाज़ी#अम्मा
सुकरात ने कहा
प्रश्न करो,
सत्ता से...धर्म से..
उसने किये भी
कुछ चुभते प्रश्न
सत्ता से..धर्म से..
उसके बाद
सुकरात,
वो सुकरात नही रहा
और फ़िर
वो सुकरात ....नही रहा
:/शंकर
#जिल्दसाज़ी
मिट गया कुछ,खो गया कुछ
कुछ कमी है... ख़ल रही है
स्तब्ध हूँ..निःशब्द हूँ,
बस साँस मद्धिम चल रही है
शूल सा अटका कहीं पर,
चुभ रहा है.. दुख रहा है
असहाय हूँ,निरुपाय हूँ
स्वप्नों की दुनिया जल रही है
:/शंकर
#जिल्दसाज़ी
सिर्फ मर्द ही नहीं रौंदते औरत का वजूद
हमारे घर की औरतों में भी,ये गुन होता है
सबने दादी नानियों से ही सुना होगा
बाँझ का मुँह देखना,अपशगुन होता है
:/शंकर