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Friday, September 9, 2011

पहला ऑर्डर कॅंसल

फ़िल्म : शोले
किस सन में रिलीज़ हुई : 1975
किसने कहा : जयदेव (अमिताभ बच्चन) 
किससे कहा : जेलर (असरानी)
सम्वाद लेखक : सलीम जावेद 

इस फ़िल्म के बहुत से सम्वाद प्रचलित हैं और लोकप्रिय हैं. पर ये सम्वाद कम याद किया जाता है. हालांकि ये सम्वाद है बहुत सशक्त. काम काजी ज़िन्दगी में अक्सर ऐसे बॉस लोगों से पाला पडता है जो घडी घडी अपना फ़ैसला बदलते रहते हैं. उन सब को ये जुमला समर्पित है. 

जय और वीरू जेल से भागने का प्लान बनाते हैं. वो एक लकडी के टुकडे को पिस्तौल बता कर, जेलर को बन्धक बना लेते हैं. बन्धक बनाते ही वीरू जेलर को अपनी जगह से ना हिलने की सख़्त हिदायत देता है. फिर  बाक़ी सिपाहियों की बन्दूकें फिंकवा देने के बाद, वीरू जेलर को अपने साथ जेल के मुख्य द्वार तक चलने के लिए कहता है. 

जेलर ज़रा लक़ीर का फ़क़ीर क़िस्म का जेलर है. अंग्रेज़ों के ज़माने का जो है. तो वो आपत्ति ज़ाहिर करता है. कहता है कि आप ही ने तो हिलने से मना किया था. सख़्त हिदायत दी थी. परेशान जय अपने चिर परिचित अन्दाज़ में ये जुमला कहते हैं. 

"पहला ऑर्डर कॅंसल"

तब जाकर जेलर को तसल्ली होती है और वो दोनों क़ैदियों को बाहर तक छोड कर आता है. 

Monday, August 1, 2011

जब तुम अच्छा कहती हो तो बहुत ही अच्छा लगता है

फ़िल्म : आन्धी
किस सन में रिलीज़ हुई : 1975
किसने कहा : जे के (संजीव कुमार)
किससे कहा : आरती देवी (सुचित्रा सेन)
सम्वाद लेखक : गुलज़ार

इस फ़िल्म में आरती (जो एक पॉलिटिशन है) और जे के (जो  एक होटेल मालिक हैं) के रिशते को दर्शाया गया है. इस सीन में, जे के आरती को फ़ोन पर कविता सुना रहे हैं. कविता सुनाने के बाद, वो आरती से पूछते हैं

"अच्छी है ना?"

जवाब में आरती कहती हैं - "बहुत अच्छी है"

फिर जेके कहते हैं

"पता है...जब तुम अच्छा कहती हो...बहुत ही अच्छा लगता है" 

कितनी सही बात कही है ना. हम सब की ज़िन्दगी में कुछ ऐसे लोग होते हैं, जिनसे तारीफ़ पाना ज़्यादा मायने रखता है. और जब वो लोग अच्छा कहते हैं...तो बहुत ही अच्छा लगता है. 

Friday, August 8, 2008

सारे अंडे अभी लेंगे या

फ़िल्म : दीवार
किस सन में रिलीज़ हुई : 1975
किसने कहा : विजय वर्मा (अमिताभ बच्चन)
किससे कहा : सामंत (मदन पुरी)
सम्वाद लेखक : सलीम जावेद

विजय वर्मा दावर के गिरोह में शामिल हो जाता है। दावर अपने एक विरोधी तस्कर सामंत से बेहद परेशान हैं। सामंत एक बेहद तेज़ तर्रार तस्कर है जो दावर के माल को चंपत कर जाता था। यानी भंवरे ने खिलाया फूल फूल को ले गया राज कुंवर।


विजय, सामंत की इसी ताक़त को उसकी कमज़ोरी बनाना चाहता है। वो जानता है कि सामंत खुफिया ख़बर का मुरीद है। विजय सामंत को सोने की एक बड़ी डेलिवरी की सूचना देता है। सामंत परवाने की तरह खींचा चला आता है। गोया उसे विजय की असलियत पर शक ज़रूर होता है। इसलिए वो विजय को अपने पास बंधक रख लेता है, जब तक उसके गुर्गे माल सकुशल उसके गोदाम में पहुंचा नही देते। माल जब पहुँच जाता है तो विजय अपने पाँच लाख रुपये मांगता है। जवाब में सामंत दराज़ से पिस्तौल निकालता है और कहता है - कि अगर वो उसे मार दे तो वो क्या करेगा। विजय अपना संतुलन खोये बगैर - एक पुरानी ईसप की कहानी सुनाते हें।
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कहानी एक किसान की, जिसके पास एक मुर्गी थी। वो मुर्गी रोज़ एक सोने का अंडा देती थी। एक दिन लोभवश किसान उस सोने के अंडे देने वाली मुर्गी का पेट चीर देता है - इस उम्मीद में की उसे सारे अंडे एक साथ मिल जायेंगे। मगर न वो मुर्गी रहती है ना वो रोजाना का एक अंडा। किसान बहुत पछताता है। इस कहानी का सार विजय बहुत खूबसूरती से एक ही जुमले में यूँ पेश करते है -
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सारे अंडे अभी लेंगे या ?