पत्रकार समाज का बौद्धिक वर्ग है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माने जाने वाला मीडिया अन्य तीनों स्तंभों- विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका- से लोकतांत्रिक आचरण की अपेक्षा करता है। मीडिया पुलिस, नौकरशाही और समाज से भी सभ्य एवं सुसंस्कारित भाषा और व्यवहार की उम्मीद करता है। तो क्या मीडिया को भी अपने आचरण के प्रति जवाबदेह नहीं होना चाहिए? क्या हमारे बात-व्यवहार और भाषा में यह नहीं दिखना चाहिए कि हम बौद्धिक तबके के प्रतिनिधि हैं और हर मतभेद को संवाद के ज़रिए सुलझाने में विश्वास रखते हैं? ज़ाहिर है, पत्रकारों की संस्था में भी वही मूल्य दिखाई देने चाहिए।
अगर पत्रकार ही सार्वजनिक मंचों पर गाली-गलौज, धमकी और असहिष्णुता का प्रदर्शन करने लगें, तो पत्रकार और गुंडे में अंतर करना मुश्किल हो जाएगा। दुर्भाग्य से 25 अक्टूबर 2025 को मुंबई प्रेस क्लब के कॉन्फ्रेंस हॉल में एक ऐसी घटना हुई जिसने मुंबई प्रेस क्लब के गौरवशाली इतिहास पर बदनुमा दाग़ लगा दिया। उस एक घटना ने मुंबई प्रेस क्लब की प्रतिष्ठा को धूल-धूसरित ही नहीं किया, बल्कि एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया। गाली-गलौज़ की भाषा किसी नए या अनुभवहीन पत्रकार ने नहीं बल्कि मुंबई प्रेस क्लब के तत्कालीन अध्यक्ष ने ही की। अपने ही समाज के किसी सदस्य को गाली देना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण घटना रही।
सोशल मीडिया के दौर में हर आदमी हर वक़्त कैमरे की जद में रहता है। इसी वजह से इस अभद्रता और उसके बाद टीवी पत्रकारों एवं कैमरापर्सनों के साथ हुए व्यवहार का वीडियो पूरे देश में देखा गया और सोशल मीडिया के माध्यम से दुनिया भर में भी पहुंचा। स्वाभाविक है कि वीडियो देखने वालों के मन में यही सवाल उठा होगा- ये पत्रकार हैं या गुंडे?
उस दुर्भाग्यपूर्ण घटना की जांच भी हुई, लेकिन गाली-गलौज़ का वीडियो मौजूद होने के बावजूद जांच रिपोर्ट ने अनेक सवाल अनुत्तरित छोड़ दिए। जांच दल ने जिस तरह के निष्कर्ष पेश किए, उसने मुंबई प्रेस क्लब के सदस्यों के मन में निष्पक्षता और जवाबदेही को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए।

यही कारण है कि इस बार मुंबई प्रेस क्लब का चुनाव केवल पदों की लड़ाई नहीं रह गया है। यह चुनाव इस बात का भी है कि मुंबई प्रेस क्लब का स्वरूप कैसा होगा। क्या प्रेस क्लब में संवाद की जगह अहंकार और तानाशाही लेगा? क्या जवाबदेही की जगह पक्षपात चलेगा? क्या असहमति का जवाब गाली और निष्कासन होगा, या लोकतांत्रिक तरीके से हर सदस्य की बात सुनी जाएगी? आज सबसे बड़ा मुद्दा किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि अच्छे आचरण, पारदर्शिता, निष्पक्षता और संस्थागत गरिमा का है। यह स्वागतयोग्य है कि इस चुनाव में इन मुद्दों पर खुलकर चर्चा हो रही है और इन्हें चुनावी बहस के केंद्र में लाया गया है।
मुंबई प्रेस क्लब किसी व्यक्ति, किसी गुट या किसी विचारधारा विशेष की जागीर नहीं है। यह प्रिंट, टीवी, डिजिटल, फोटो, स्वतंत्र एवं सेवानिवृत्त पत्रकारों की अपनी संस्था है। इसलिए मतदान करते समय हमें यह नहीं देखना होगा कि कौन किसके साथ खड़ा है, बल्कि यह देखना होगा कि कौन प्रेस क्लब की गरिमा, लोकतांत्रिक परंपरा और पत्रकारिता के मूल्यों के साथ खड़ा है।
मुंबई प्रेस क्लब का चुनाव केवल अध्यक्ष, सचिव या अन्य पदों के लिए मतदान भर नहीं है। यह चुनाव इस बात का भी है कि हम अपने सबसे प्रतिष्ठित पत्रकार संगठन को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं। इस चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा अच्छा आचरण, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक संस्कृति है। ध्यान रखिए, यदि पत्रकार ही सार्वजनिक मंचों पर गाली-गलौज, धमकी और असहिष्णु व्यवहार का उदाहरण पेश करेंगे, तो समाज के सामने हमारी नैतिक विश्वसनीयता क्या रह जाएगी।
इसीलिए इस बार यह देखना महत्वपूर्ण है कि कौन-सा पैनल इन मूल्यों को सबसे अधिक प्राथमिकता देता है। यदि कोई पैनल या उम्मीदवार अच्छे आचरण, जवाबदेही, पारदर्शिता और संस्थागत गरिमा को अपना प्रमुख मुद्दा बना रहा है, तो सदस्यों को उसके दृष्टिकोण पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। मुंबई प्रेस क्लब की पहचान उसकी इमारत से नहीं, बल्कि उसके लोकतांत्रिक चरित्र, उसकी गरिमा और उसके सदस्यों के आचरण से बनेगी।
यह चुनाव केवल वोट का नहीं, बल्कि हमारी पेशेवर आत्मा और आने वाली पीढ़ी के पत्रकारों के लिए एक संदेश का चुनाव है। सोचिए… आपका एक वोट केवल पदाधिकारी नहीं चुनेगा, बल्कि मुंबई प्रेस क्लब का चाल, चरित्र और चेहरा भी तय करेगा।









