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आदर्शवाद की उम्मीद स्त्री से ही क्यों?

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हरिगोविंद विश्वकर्मा

भारतीय समाज में स्त्री को बहुत ऊंचा स्थान दिया गया है। उसे देवी कहा जाता है। शक्ति और ममता की मूर्ति कहा जाता है। लेकिन कभी-कभी ऐसा लगता है कि स्त्री को इतना ऊंचा स्थान देने के पीछे कहीं उसे इंसान मानने से बचने की कोशिश तो नहीं है? देवी आदर्श स्त्री है। गलतियां नहीं करती। देवी न तो कभी थकती है और न ही कभी शिकायत करती है। देवी अपने लिए कुछ नहीं मांगती, जो कुछ मांगती है या करती है, वह सब दूसरों के लिए। देवी सब कुछ सहती है और शायद इसी वजह से स्त्री से भी हमेशा आदर्श होने की उम्मीद की जाती है।

बेटी के रूप में स्त्री से उम्मीद की जाती है कि वह संस्कारी हो। बहू के रूप में स्त्री से उम्मीद होती है कि वह पूरे परिवार को साथ लेकर चले। पत्नी के रूप में स्त्री से कहा जाता है कि वह पति का साथ हर परिस्थिति में दे। मां के रूप में स्त्री से अपेक्षा होती है कि वह बच्चों के लिए अपनी हर इच्छा त्याग दे। इसी तरह नौकरी करने वाली स्त्री से उम्मीद की जाती है कि काम पूरी निष्ठा से करे और घर भी कुशलता से संभाले। लेकिन पुरुष के लिए आदर्श भूमिकाओं वाली सूची है ही नहीं।

एक पुरुष देर से घर आए तो कहा जाता है, काम में व्यस्त होगा। वही काम अगर स्त्री को देर तक रोक ले तो सवाल उठने लगते हैं। पुरुष करियर के लिए दूसरे शहर जाए तो उचित माना जाता है, लेकिन महिला ऐसा करे तो उस पर परिवार की अनदेखी के आरोप लगते हैं। पुरुष दोस्तों के साथ समय बिताए तो सामान्य है, लेकिन महिला अपने लिए समय निकाले तो लापरवाह कहलाती है। उसे अपने दायित्वों की याद दिलाया जाता है। यह दोहरा मापदंड केवल बाहर नहीं है। कई बार यह घर की चारदीवारी में ही पैदा होता है।

बेटी से बचपन से ही कहा जाता है, बेटी, तुम्हें तो ससुराल जाना है, थोड़ा समझौता करना सीखो। परंतु बेटे से नहीं कहा जाता, बेटे, तुम्हें भी किसी का पति बनना है, समझौते करना सीखो बेटी को बचपन से गृह कार्य सिखाए जाते हैं क्योंकि आगे काम आएंगे। बेटे को क्यों नहीं सिखाया जाता कि घर चलाना भी जीवन का जरूरी कौशल है? आखिर स्त्री से इतने त्याग की अपेक्षा करना इतना सहज क्यों है? समाज ने त्याग को स्त्री का गुण बना दिया है और अधिकार को उसका प्रश्न। समाज सहनशीलता को स्त्री की खूबी मानता है। प्रतिरोध को स्त्री की कमी। वह चुप रहे तो संस्कारी है। वह सवाल करे तो जिद्दी है। वह सब सह ले तो अच्छी स्त्री है। अपने सम्मान के लिए खड़ी हो जाए तो स्वार्थी स्त्री।

स्त्री भी इंसान है। वह भी थक सकती है। उसे भी गुस्सा आ सकता है। उसे भी अपने लिए समय चाहिए। वह भी गलती कर सकती है। उसे भी कभी-कभी परिवार से अलग अपनी दुनिया चाहिए। उसके भी सपने हो सकते हैं जो पत्नी, मां या बहू बनने से अलग हों। इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है। दरअसल, मूल समस्या यह है कि समाज ने स्त्री को इंसान से पहले उसकी भूमिका में देखना शुरू कर दिया है। वह मां है, तो उसे त्याग करना चाहिए। वह पत्नी है, तो उसे समझौता करना चाहिए। वह बहू है, तो उसे सबको खुश रखना चाहिए। वह बेटी है, तो उसे परिवार की इज्जत का ध्यान रखना चाहिए। लेकिन वह स्वयं भी एक व्यक्ति है, यह बात समाज अक्सर भूल जाता है।

स्त्री को आदर्श बनाने की कोशिश में हमने उसके वास्तविक संघर्षों को छोटा कर दिया। मां बच्चे पर कभी नाराज हो जाए तो उसे अपराधबोध होता है। पत्नी पति से असहमति जताए तो उसे लगता है कि शायद वह अच्छी पत्नी नहीं है। बेटी माता-पिता की किसी बात से असहमत हो जाए तो उसे डर रहता है कि कहीं उसे स्वार्थी न समझ लिया जाए। आखिर क्यों? क्या पुरुष को हर रिश्ते में आदर्श होने की ऐसी परीक्षा देनी पड़ती है? इसका अर्थ यह नहीं कि पुरुष जिम्मेदार नहीं हैं, या स्त्रियां हमेशा सही हैं। दोनों मनुष्य हैं, इसलिए दोनों से गलतियां होंगी। दोनों को अपने रिश्तों के प्रति जिम्मेदार होना चाहिए। लेकिन जिम्मेदारी और आदर्शवाद में फर्क है। इंसान से जिम्मेदारी अपेक्षित हो सकती है, पर पूर्णता की मांग किसी इंसान से नहीं की जा सकती। स्त्री को देवी बनाने की जरूरत नहीं है। उसे बराबरी का इंसान मानने की जरूरत है।

स्त्री को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वह कहे, आज मैं थकी हूं। आज मुझे मदद चाहिए। आज मैं असहमत हूं। आज मैं अपने लिए कुछ करना चाहती हूं। और कभी-कभी वह यह भी कह सके, ‘मैं गलत थी। गलती करने का अधिकार भी इंसान होने का हिस्सा है। बेटियों को केवल आदर्श बनने की सीख न दी जाए। उन्हें स्वतंत्र सोचने, निर्णय लेने और अपनी सीमाएं तय करने की सीख दी जाए। बेटों को भी यह सिखाएं कि घर और रिश्ते केवल महिलाओं की जिम्मेदारी नहीं हैं। तो अगली बार जब किसी स्त्री से कहें, तुम तो स्त्री हो, तुम्हें तो समझना चाहिए’, तो एक पल रुककर खुद से भी पूछें, क्या समझना, सहना और त्याग करना केवल स्त्री का ही कर्तव्य है?’ अब समय आ गया है कि स्त्री से आदर्शवाद की उम्मीद करने के बजाय उससे वही ईमानदारी, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की उम्मीद की जाए जो हर इंसान से की जाती है। उसे भी इंसान की तरह जीने दिया जाए। देवी बनने का बोझ उस पर न लादा जाए। उसे बस एक स्त्री रहने दिया जाए।

इसे भी पढ़ें – घर से बाहर निकलते वक्त इतना सोचती क्यों है स्त्री?

घर से बाहर निकलते वक्त इतना सोचती क्यों है स्त्री?

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हरिगोविंद विश्वकर्मा

एक लड़की जब घर से बाहर निकलती है तो उसके साथ सिर्फ उसका बैग नहीं होता, बल्कि उसके साथ कई हिदायतें चलती हैं। मसलन, जल्दी लौटना, रास्ते में किसी से बात मत करना, सुनसान जगह से मत जाना, फोन चालू रखना, किसी अनजान पर भरोसा मत करना आदि-आदि… सबसे बड़ीव बात, स्त्री की उम्र बढ़ती है। जिम्मेदारियां बदलती हैं। लेकिन हिदायतें वही की वही रहती हैं। उसके साथ चलती रहती हैं। कभी किसी ने सोचा है कि एक स्त्री को आखिर इतनी सावधानी से क्यों जीना पड़ता है? पुरुष देर रात घर से निकलता है तो उसके परिवार को चिंता हो सकती है, लेकिन एक महिला देर रात घर लौटती है तो चिंता के साथ-साथ डर भी जुड़ जाता है। वह सड़क पर चलते हुए पीछे मुड़कर देखती है। खाली ऑटो या कैब में बैठते समय वाहन का नंबर देखती है। किसी सुनसान रास्ते पर कदम तेज कर देती है। मोबाइल हाथ में रखती है, जरूरत पड़ने पर किसी को फोन करने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कि कोई यह न समझे कि वह बिल्कुल अकेली है। यह डर दिखाई नहीं देता, लेकिन उसकी जिंदगी के फैसलों को प्रभावित करता है।

कितनी लड़कियां नौकरी इसलिए छोड़ देती हैं, क्योंकि ऑफिस बहुत दूर है? कितनी महिलाएं देर तक काम करने से इसलिए बचती हैं, क्योंकि घर लौटने का रास्ता सुरक्षित नहीं है? कितनी छात्राएं अपनी पसंद का कॉलेज सिर्फ इसलिए नहीं चुन पातीं, क्योंकि वहां आने-जाने में परेशानी होती है? कितनी महिलाएं किसी कार्यक्रम, यात्रा या अवसर को यह सोचकर छोड़ देती हैं कि रात में कैसे लौटेंगी?’ अक्सर कहा जाता है कि आज महिलाएं पहले से अधिक स्वतंत्र हैं। वे पढ़ रही हैं। नौकरी कर रही हैं। कारोबार कर रही हैं। हवाई जहाज उड़ा रही हैं। सेना में जा रही हैं। देश का नेतृत्व कर रही हैं। यह सच है। लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ केवल अवसर मिल जाना नहीं है। स्वतंत्रता का असली अर्थ है, बिना अनावश्यक डर के उन अवसरों का उपयोग कर पाना। एक महिला को आत्मनिर्भर बनने के लिए कहा जाता है, लेकिन क्या समाज ने उसके रास्ते सुरक्षित किए हैं?

उसे कहा जाता है कि तुम अपनी आवाज उठाओ। लेकिन जब वह किसी छेड़छाड़ या उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाती है तो पहला सवाल कई बार उसी से पूछा जाता है, तुम आखिर वहां गई ही क्यों थी? तुमने ऐसे कपड़े क्यों पहने थो? इतनी रात को तु बाहर क्यों थी? तुमने पहले ही विरोध क्यों नहीं किया? दरअसल, यह यही परिस्थित है जहां समाज को अपने भीतर झांकने की जरूरत है। किसी महिला के साथ गलत व्यवहार का कारण उसका कपड़ा, उसका समय, उसकी नौकरी, उसका अकेले सफर करना या उसका खुलकर बोलना नहीं हो सकता। गलत व्यवहार करने वाला व्यक्ति ही उसके लिए जिम्मेदार है। हमें अपनी बेटियों को सावधान करना चाहिए, लेकिन केवल बेटियों को सावधान करते रहना समाधान नहीं है। बेटों को भी यह सिखाना होगा कि किसी महिला का नो कहना क्या होता है? महिला की असहमति का सम्मान क्या होता है? उसकी चुप्पी का अर्थ सहमति तो बिल्कुल भी नहीं होता और किसी महिला को घूरना, पीछा करना, टिप्पणी करना या उसकी निजी सीमा में दखल देना मजाक नहीं है, बल्कि अपराध है।

सुरक्षा केवल पुलिस की जिम्मेदारी भी नहीं हो सकती। सड़क की रोशनी से लेकर सार्वजनिक परिवहन तक, कार्यस्थल की व्यवस्था से लेकर शिकायत तंत्र तक, समाज की पूरी व्यवस्था को ऐसा होना चाहिए कि महिला को हर कदम पर अपनी सुरक्षा का हिसाब न लगाना पड़े। और शायद सबसे बड़ा बदलाव घर से शुरू होगा। जब कोई बेटी कहे कि वह अकेले यात्रा करना चाहती है तो पहला जवाब लोग क्या कहेंगे?’ नहीं, बल्कि तुम सुरक्षित कैसे रहोगी?’ होना चाहिए। जब पत्नी देर से घर लौटे तो उससे पूछताछ के बजाय उसकी थकान समझी जानी चाहिए। जब मां अपने लिए नौकरी, यात्रा या कोई नया सपना चुने तो परिवार को यह नहीं पूछना चाहिए कि इस उम्र में इसकी क्या जरूरत है?’, क्योंकि स्त्री की आजादी केवल युवावस्था का अधिकार नहीं है। उसका हर उम्र में अपना जीवन चुनने का अधिकार है।

आज अपने आसपास की दुनिया को ऐसी दुनिया बनाने की जरूरत है, जहां लड़की को घर से निकलते समय यह न सोचना पड़े कि रास्ते में कौन मिलेगा? जहां महिला को देर से घर लौटने पर अपनी सुरक्षा को लेकर भयभीत न होना पड़े। जहां उसे अपने कपड़ों, आवाज या जीवनशैली के लिए सफाई न देनी पड़े। बेटियों को मजबूत बनाना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि हम समाज को जिम्मेदार बनाएं, क्योंकि किसी महिला से यह कहना आसान है कि डरो मत। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या हम ऐसा समाज बना रहे हैं जिसमें उसे डरने की जरूरत ही न पड़े? जिस दिन इसका जवाब हांहोगा, उसी दिन हम सचमुच कह सकेंगे कि हमारी बेटियां आजाद हैं।

इसे भी पढ़ें – जब अपने लिए खड़ी होती है एक स्त्री

जब अपने लिए खड़ी होती है एक स्त्री 

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हरिगोविंद विश्वकर्मा

भारतीय समाज में स्त्री के जीवन की कहानी अक्सर दूसरों से शुरू होती है और दूसरों पर ही समाप्त हो जाती है। बेटी बनकर वह माता-पिता की चिंता समझती है, पत्नी बनकर पति के सपनों को अपना सपना बना लेती है और मां बनकर बच्चों के भविष्य के लिए अपनी इच्छाओं को चुपचाप त्याग देती है। उसके हिस्से में बेशक प्रेम बहुत आता है, लेकिन अपने लिए समय बहुत ही कम। उसकी जिम्मेदारियां गिनी जाती हैं, उसके त्याग की प्रशंसा होती है, मगर उसके सपनों के बारे में अक्सर कोई बात नहीं करता। लेकिन अब समय बड़ी तेजी से बदल रहा है। धीरे-धीरे ही सही, स्त्री ने यह सवाल पूछने लगी है कि उसके जीवन में उसकी इच्छा की जगह कहां है? यह सवाल विद्रोह नहीं है। यह अपने अस्तित्व की पहचान है।

किसी महिला का अपने लिए निर्णय लेना परिवार से दूर जाना क़तई नहीं है। अपने सपने देखना स्वार्थ क़तई नहीं है। आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना परिवार के प्रति जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ना क़तई नहीं है। बल्कि आत्मनिर्भर स्त्री परिवार को अधिक मजबूती देती है, क्योंकि वह परिस्थितियों की मार के सामने केवल सहारे की प्रतीक्षा नहीं करती, बल्कि स्वयं सहारा बनने की क्षमता रखती है। अक्सर बड़ी-बड़ी सफल महिलाओं की कहानियां पढ़ने को मिलती हैं। कोई अंतरिक्ष तक पहुंचती है, कोई खेल के मैदान में देश का नाम रोशन करती है, कोई कारोबार खड़ा करती है, कोई पत्रकारिता में अपनी आवाज बुलंद करती है। लेकिन स्त्री की असली प्रेरक कहानियां हमेशा सुर्खियों में नहीं आतीं।

वह महिला भी प्रेरणा है जो सुबह सबसे पहले उठती है और रात में सबसे आखिर में सोती है। वह मां भी प्रेरणा है जिसने अपने बच्चों की फीस भरने के लिए अपनी जरूरतें रोक दीं। वह बेटी भी प्रेरणा है जिसने अपने बूढ़े माता-पिता का हाथ थामा। वह पत्नी भी प्रेरणा है जिसने पति की बीमारी या बेरोजगारी के समय घर की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली। और वह गृहिणी भी कम सफल नहीं, जो वर्षों तक परिवार संभालने के बाद एक दिन अपने भीतर दबे किसी पुराने सपने को फिर से जिंदा कर देती है। स्त्री की सफलता का पैमाना केवल उसका पद, पैसा या प्रसिद्धि नहीं हो सकता। कभी-कभी अपने डर पर जीत हासिल करना ही उसकी सबसे बड़ी सफलता होती है।

समाज ने लंबे समय तक स्त्री की अधिकार न जमाने की प्रवृत्ति और उसकी सहनशीलता को उसका सबसे बड़ा गुण माना। निस्संदेह सहनशीलता एक शक्ति है, लेकिन हर अन्याय को सहते रहना शक्ति नहीं है। जहां सम्मान समाप्त हो जाए, वहां चुप्पी समाधान नहीं हो सकती। स्त्री को यह अधिकार होना चाहिए कि वह गलत को गलत कह सके, अपने निर्णय पर कायम रह सके और आवश्यकता पड़ने पर अपने लिए आवाज उठा सके। इसके लिए केवल महिलाओं को बदलने की जरूरत नहीं है। पुरुषों को भी अपनी सोच बदलनी होगी।

जब एक पिता अपनी बेटी से कहता है, “तुम जो बनना चाहो, वह बनो”, तब वह केवल अपनी बेटी का भविष्य नहीं बदलता, बल्कि आने वाली पीढ़ी की सोच बदलता है। एक पति जब पत्नी के सपनों को उतना ही महत्व देता है जितना अपने सपनों को, तो वह विवाह को केवल जिम्मेदारी नहीं, साझेदारी बनाता है। एक भाई जब बहन के फैसले पर विश्वास करता है, तो वह उसके भीतर आत्मविश्वास पैदा करता है। महिला सशक्तिकरण पुरुषों के विरुद्ध संघर्ष नहीं है। यह बराबरी की मांग है—ऐसी बराबरी जिसमें स्त्री को अपने जीवन का निर्णय लेने के लिए किसी की अनुमति न मांगनी पड़े।

फिर भी स्त्री की सबसे बड़ी लड़ाई बाहर की दुनिया से नहीं, कई बार स्त्री के भीतर बैठे उस डर से है, जो वर्षों की सामाजिक कंडिशनिंग ने पैदा किया है… “लोग क्या कहेंगे?”, “अगर असफल हो गई तो?”, “उम्र निकल गई है”, “अब यह सब कैसे होगा?” इन सवालों का जवाब केवल एक है। शुरुआत करने के लिए कभी देर नहीं होती। एक स्त्री पचास की उम्र में पढ़ाई शुरू करे, साठ की उम्र में अपना काम शुरू करे, वर्षों बाद लिखना शुरू करे या जीवन की किसी असफलता के बाद फिर खड़ी हो जाए, उसका प्रयास उतना ही महत्वपूर्ण है जितना किसी युवा की पहली सफलता, क्योंकि जिंदगी उम्र नहीं पूछती, साहस पूछती है।

आज के दौर में जरूरत इस बात की है कि हम अपनी बेटियों को केवल सुरक्षित रहना ही न सिखाएं, बल्कि उन्हें सक्षम बनना भी सिखाएं। उन्हें केवल अच्छे संस्कार न दें, आत्मविश्वास भी दें। उन्हें केवल दूसरों का सम्मान करना न सिखाएं, अपने सम्मान की रक्षा करना भी सिखाएं, क्योंकि जब एक स्त्री अपने पैरों पर खड़ी होती है, तो वह अकेली नहीं उठती। उसके साथ उसका परिवार उठता है, उसकी अगली पीढ़ी उठती है और समाज की सोच एक कदम आगे बढ़ती है। आज समाज का दायित्व है कि वह स्त्री को अवसर दे। उस पर विश्वास करे और उसके सपनों को सुने, क्योंकि जिस दिन एक स्त्री अपने भीतर से यह आवाज सुन लेती है, “मैं भी कर सकती हूं”, उसी दिन उसके जीवन की सबसे खूबसूरत यात्रा शुरू हो जाती है।

इसे भी पढ़ें – सबको खुश रखना स्त्री की ज़िम्मेदारी नहीं

स्त्री के अपराध का पक्षपातपूर्ण आकलन

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हरिगोविंद विश्वकर्मा
समाज में अपराध की कोई जाति, धर्म या लिंग नहीं होती। अपराध, अपराध है। चाहे उसे पुरुष करे या स्त्री। लेकिन हमारा सामाज अब भी इस सच को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। पुरुष अपराध करता है तो लोग अक्सर उसके अपराध के पीछे परिस्थितियां खोजने लगते हैं। गुस्से में कर दिया होगा, गलती हो गई होगी, लड़कों से ऐसी गलतियां हो जाती हैं। लेकिन जैसे ही किसी स्त्री पर अपराध का आरोप लगता है, वही समाज अचानक नैतिकता का पहरेदार बन जाता है। उसके अपराध से ज्यादा उसके चरित्र पर चर्चा होने लगती है। यही सबसे बड़ी विडंबना है।

किसी पुरुष के अपराध को कई बार उसके व्यक्तित्व से अलग करके देखा जाता है, लेकिन स्त्री के अपराध को सीधे उसकी पूरी स्त्री-सत्ता से जोड़ दिया जाता है। यह मान लिया जाता है कि अगर किसी स्त्री पर आरोप लगा तो वह शर्तिया “बुरी औरत” है। उसने कोई गंभीर गलती की है तो उसके चरित्र पर सवाल उठने लगता है। अगर स्त्री ने पति, परिवार या समाज के विरुद्ध कोई कदम उठाया तो उसके पीछे की कहानी जानने की कोशिश करने के बजाय फैसला सुना दिया जाएगा। “ऐसी औरतों को तो…” जैसे वाक्य हमारे समाज में बहुत आसानी से निकल आते हैं। लेकिन सवाल यह है कि हम फैसला सुनाने की इतनी जल्दी में क्यों रहते हैं?

किसी स्त्री ने अपराध किया है तो उसे कानून के अनुसार सजा मिलेगी। इसमें कोई दो राय नहीं। स्त्री होने के कारण उसे अपराध से छूट नहीं मिलेगी। लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि स्त्री होने के कारण उसे बिना पूरी सच्चाई जाने दोषी भी नहीं ठहराया जाना चाहिए। हर अपराध के पीछे एक कहानी होती है। और उस कहानी को सुने बिना न्याय संभव नहीं। कई बार जिस स्त्री को समाज अपराधी कह रहा होता है, वह वर्षों से घरेलू हिंसा, मानसिक प्रताड़ना, आर्थिक निर्भरता, सामाजिक दबाव या किसी अन्य शोषण से गुजर रही होती है। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि वह अपराध करने के लिए अधिकृत हो जाती है। लेकिन उसके अपराध को समझने के लिए उसकी परिस्थितियों को समझना जरूरी है।

दुर्भाग्य यह है कि पुरुष के मामले में समाज परिस्थितियों को देखता है और स्त्री के मामले में चरित्र। पुरुष ने पत्नी की हत्या कर दी तो चर्चा होती है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ। लेकिन अगर किसी स्त्री पर पति की हत्या का आरोप लग जाए तो तुरंत सवाल उठता है…“पत्नी होकर ऐसा कैसे कर सकती है?” मानो विवाह के साथ स्त्री ने अपने सारे अधिकार, सारे सवाल और अपनी सारी पीड़ा भी गिरवी रख दी हो। स्त्री से समाज आज भी एक खास तरह की छवि की अपेक्षा करता है। वह सहनशील हो, त्याग करे, परिवार बचाए, चुप रहे, समझौता करे और हर परिस्थिति में “अच्छी औरत” बनी रहे। वह जब इस निर्धारित भूमिका से बाहर निकलती है तो समाज उसके व्यवहार से ज्यादा उसके चरित्र पर हमला करता है।

यही कारण है कि स्त्री के अपराध की खबर कई बार अपराध से अधिक सनसनी बन जाती है। मीडिया की भाषा बदल जाती है। सोशल मीडिया पर टिप्पणियां शुरू हो जाती हैं। उसके कपड़े, उसके रिश्ते, उसकी निजी जिंदगी, उसके कथित प्रेम संबंध सब कुछ सार्वजनिक बहस का हिस्सा बना दिया जाता है। पुरुष आरोपी के मामले में ऐसी पड़ताल अक्सर उतनी तीखी नहीं होती। यह मानसिकता केवल पुरुषों की नहीं है। बहुत-सी महिलाएं भी दूसरी महिला को उसी कठघरे में खड़ा करती हैं, जिसमें सदियों से पितृसत्तात्मक समाज ने उसे खड़ा किया है। क्योंकि यह केवल कानून का सवाल नहीं, हमारी सामाजिक सोच का सवाल है।

समाज को यह समझना होगा कि स्त्री को देवी बनाना भी अन्याय है और उस पर आरोप लगने पर उसे राक्षसी बना देना भी उसके साथ अन्याय है। स्त्री भी इंसान है। उसमें अच्छाई हो सकती है, बुराई हो सकती है, कमजोरी हो सकती है, क्रोध हो सकता है और गलत निर्णय लेने की संभावना भी हो सकती है। वह अपराध करे तो कानून अपना काम करे। लेकिन समाज को अदालत बनने की जरूरत नहीं है। किसी भी आरोपी को पहले अपराधी घोषित कर देना और बाद में उसकी कहानी सुनना न्याय नहीं, भीड़ का फैसला है। न्याय की पहली शर्त है- पूरी बात सुनना, तथ्यों को देखना और आरोप तथा अपराध के बीच का फर्क समझना।

इसलिए बार जब किसी स्त्री पर अपराध का आरोप लगे तो उसके खिलाफ फैसला सुनाने से पहले समाज को एक सवाल जरूर पूछना चाहिए, “उसकी कहानी क्या है?” मुमकिन है वह वास्तव में अपराधी हो। तब कानून उसे जरूर सजा देगा। लेकिन यह भी हो सकता है कि कहानी वैसी बिल्कुल न हो, जैसी समाज ने अपने मन में बना ली है। स्त्री को बचाने के लिए नहीं, न्याय को बचाने के लिए उसका पक्ष सुनना जरूरी है। क्योंकि सभ्य समाज की पहचान यह नहीं है कि वह अपराधी को कितनी जल्दी दंडित करता है। उसकी असली पहचान यह है कि वह किसी को दोषी ठहराने से पहले उसकी पूरी कहानी सुनने का धैर्य कितना रखता है।

सबको खुश रखना स्त्री की ज़िम्मेदारी नहीं

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हरिगोविंद विश्वकर्मा
भारतीय समाज में लड़कियों को बचपन से एक बात सिखाई जाती है। सबका सम्मान करो, सबका ख्याल रखो और किसी को नाराज़ मत करो। लड़की के स्त्री बनने पर धीरे-धीरे यही सीख उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती है। स्त्री घर में हों या दफ़्तर में, रिश्तों में हों या समाज में, वह हर किसी को खुश रखने की कोशिश करती है। लेकिन एक सवाल शायद ही कभी पूछा जाता है। जो सबको खुश रखने में अपना जीवन खपा देती है, उसकी खुशी का ख्याल कौन रखेगा?

हर मानवीय रिश्ते का खूबसूरत पक्ष स्नेह, सम्मान और सहयोग होता है, लेकिन जब किसी एक व्यक्ति पर हर समय सबको खुश रखने की जिम्मेदारी थोप दी जाए, तो यह जिम्मेदारी बोझ लगने लगती है और अंततः रिश्ता ही बोझ बन जाता है। कई महिलाएं अपनी इच्छा या अपने मन की बात केवल इसलिए व्यक्त नहीं करती हैं कि कहीं किसी को बुरा न लग जाए। वे अपनी थकान छिपा लेती हैं, अपने सपनों को दम तोड़ते देखती हैं और तमाम परेशानियों के बावजूद मुस्कुराने की कोशिश करती हैं। दूसरों की उम्मीदों पर खरा उतरने की कोशिश करते-करते स्त्रियां खुद से ही दूर होती चली जाती हैं।

भारत में यह केवल हाउसवाइफ की कहानी नहीं है। नौकरी करने वाली महिलाओं के सामने भी यही चुनौती होती है। दफ़्तर में अपने हिस्से का काम को अच्छी तरह से निपटाना, घर की सभी जिम्मेदारियां निभाना, बच्चों का ध्यान रखना, रिश्तेदारों की अपेक्षाएं पूरी करना और हर समय मुस्कुराते रहना बहुत कठिन कार्य है। समाज अक्सर स्त्रियों की सफलता देखता है, लेकिन उसके पीछे छिपी मानसिक और शारीरिक थकान को नहीं देखता।

यह भी कठोर सच है कि किसी भी इंसान के लिए हर समय सबको खुश रखना संभव ही नहीं है। हर व्यक्ति का स्वभाव अलग होता है। उसकी सोच अलग होती है। उसकी अपेक्षाएं अलग होती हैं। और तो और उसकी प्राथमिकताएं भी अलग होती हैं। ऐसे में आप चाहे जितनी कोशिश कर लें, कोई न कोई आपसे असहमत रहेगा। कोई न कोई आपसे नाराज रहेगा ही। इसलिए स्त्री को अपनी पूरी ऊर्जा दूसरों की स्वीकृति पाने में खर्च करने के बजाय अपने जीवन को संतुलित बनाने में लगाना चाहिए।

इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि आप स्वार्थी बन जाएं और रिश्तों की परवाह करना एकदम से छोड़ दें। इसका मतलब केवल इतना है कि दूसरों की खुशी के साथ-साथ अपनी खुशी को भी महत्व दें। अगर आप थक गई हैं, तो आराम करना कोई अपराध नहीं है। अगर आप किसी परिजन की किसी बात से असहमत हैं, तो विनम्रतापूर्वक अपनी बात रखना किसी भी दृष्टि से गलत नहीं है। और अगर किसी दिन आप हर किसी की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पातीं, तो इसका मतलब यह नहीं कि आप असफल हैं।

कई बार ना कहना भी जीवन का एक महत्वपूर्ण हुनर होता है। हर अनुरोध स्वीकार करना, हर जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लेना और हर समस्या का समाधान अकेले करने की कोशिश करना अंततः आपको ही थका देता है। याद रखें, आत्मसम्मान और अपनी देखभाल भी उतने ही जरूरी हैं, जितना दूसरों का सम्मान और उनकी देखभाल रखना। यह बात किशोर लड़कियों के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

आज सोशल मीडिया का दौर है। हर कोई चाहता है कि लोग उसे पसंद करें, उसकी तस्वीरों पर अधिक लाइक आएं, उसके बारे में अच्छी बातें लिखी जाएं। लेकिन दूसरों की स्वीकृति पर आधारित आत्मविश्वास बहुत कमजोर होता है। असली आत्मविश्वास तब पैदा होता है, जब आप अपनी कमियों और खूबियों के साथ खुद को स्वीकार करना सीख जाती हैं। जीवन हमें यह नहीं सिखाता कि हर किसी को खुश रखो। जीवन यह सिखाता है कि अपने व्यवहार में संवेदनशील रहो, लेकिन अपनी पहचान मत खोओ।

दूसरों के लिए जीना अच्छी बात है, पर अपने लिए जीना भी उतना ही जरूरी है। जो व्यक्ति अपनी खुशी, अपनी सेहत और अपना इच्छा पर ध्यान नहीं देता है, वह लंबे समय तक किसी और को भी खुश नहीं रख सकता। दूसरों का सम्मान करें, उनकी मदद भी करें, लेकिन अपनी खुशी की कीमत पर नहीं। क्योंकि अच्छी बेटी, अच्छी बहू, अच्छी पत्नी या अच्छी मां बनने से पहले आपका एक अच्छा और स्वस्थ इंसान होना जरूरी है। याद रखें, सबको खुश रखना आपकी ज़िम्मेदारी नहीं है। लेकिन खुद को सम्मान देना आपकी सबसे पहली ज़िम्मेदारी है। यह आपका अपने प्रति फर्ज भी है।

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व्यंग्य – गाली को कानूनी जामा पहनाने की जरूरत

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-हरिगोविंद विश्वकर्मा

गाली समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। लोग गाली का भरपूर उपयोग करने लगे हैं। कभी-कभी कहीं-कहीं गाली को असंसदीय और अलोकतांत्रिक शब्द कह दिया जाता है। यह गाली का अपमान है। गाली देने वाले का अपमान है। गाली खाने वाले का भी अपमान है। गाली समाज में सर्वव्यापी है। सुबह से शाम तक हर जगह सुनी जाती है। कोई गाली देता है। कोई गाली खाता है। कोई गाली देकर अपनी ताकत और दबंगई दिखाता है। तो कोई गाली खाकर अपनी लोकप्रियता और शक्ति का प्रदर्शन करता है। जब गाली इतनी लोकप्रिय और सर्वव्यापी बो चुकी है तो उसे अनौपचारिक क्यों रखा जाए? आखिर गाली भी तो एक अभिव्यक्ति है। देश में हर तरह की अभिव्यक्ति पर चर्चा होती है। फिर गाली को ही उपेक्षित क्यों रखा जाए? ऐसे में समय की मांग है। गाली को बाकायदा कानूनी जामा पहनाया जाना चाहिए।

सबसे सबसे पहले राष्ट्रीय गाली कमिशन का गठन होना चाहिए। उसका काम गाली के विकास, प्रसार और संरक्षण पर नजर रखना हो। उसमें गाली विशेषज्ञ, समाजशास्त्री, भाषाविद और अनुभवी गालीबाज शामिल किए जाएं। जो लोग समाज में गालीबाज की इमैज रखते हैं। उन लोगों को कमिशन में प्राथमिकता मिले। इसके अलावा जो रोज गाली खाते हैं, उन्हें भी शामिल किया जाए। इससे कमिशन को व्यावहारिक अनुभव मिलेगा।

भविष्य में गाली देने वाले के लिए लाइसेंस की व्यवस्था भी की जानी चाहिए। गाली देने के पास गाली देने का लाइसेंस हो। लाइसेंस लेने से पहले उम्मीदवार की परीक्षा ली जा सकती है। परीक्षा में उसके गाली देने के हुनर की जांच कर लेनी चाहिए। इसके अलावा गालियों का वर्गीकरण भी होना चाहिए। उसकी भी अलग-अलग श्रेणियां बनाई जानी चाहिए। मतलब- पहली सामान्य गाली, उसके बाद गंभीर गाली, उससे भी ऊपर अति गंभीर गाली और सबसे ऊपर वीआईपी गाली। सामान्य गाली आम नागरिकों के लिए हो। गंभीर गाली सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों के लिए। अति गंभीर गाली का इस्तेमाल केवल विशेष परिस्थितियों में किया जाए। जबकि वीआईपी गाली देने का अधिकार केवल उन लोगों को मिले, जिन्होंने गाली विज्ञान में असाधारण योग्यता हासिल की हो।

गाली की गुणवत्ता की जांच करने के लिए जगह-जगह प्रयोगशालाएं बनाई जानी चाहिए। वहां विशेषज्ञ जांच करेंगे कि गाली किस कैटेगरी की है। गाली में पर्याप्त भावनात्मक तीव्रता है या नहीं। जो गाली कमजोर पाई जाए, उसे वापस कर दिया जाए। गाली देने वाले व्यक्ति को बेहतर प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। सरकार राष्ट्रीय गाली कौशल विकास योजना भी शुरू कर सकती है। इससे गालीबाजों को ट्रेंड करने में सुभीता होगी। गाली के संरक्षण के लिए एक और काम अपरिहार्य है। हर नागरिक को साल में गालियां देने और गालियां खाने का अधिकार मिले। अगर किसी व्यक्ति ने पूरे साल एक भी गाली नहीं दी तो माना जाए कि परिपक्व नागरिक नहीं बन सका है। इसी तरह जिस किसी व्यक्ति को साल भर एक भी गाली नसीब न हो तो मान लेना चाहिए कि उसके मौलिक अधिकार का हनन हुआ।

ऐसे लोगों को टीवी चैनलों की डिबेट में भेजा जाए, ताकि बाकी पैनलिस्ट उस व्यक्ति को जम कर गाली दे सके। इससे गाली इंडस्ट्री को भी बढ़ावा मिलेगा। संसद में भी गाली को लेकर स्पष्ट नियम बनना चाहिए। अभी वहां बहुत कम लोग गाली देते हैं। वहज यह है कि कोई सदस्य अगर गाली देता है तो उसे असंसदीय मान लिया जाता है। यह गालीबाज के साथ के साथ अन्याय है। बेहतर होगा कि संसद की कार्यवाही में गालियों की अलग श्रेणी तय हो। सामान्य गाली को रिकॉर्ड में रखा जाए। गंभीर गाली को तारांकित किया जाए। अति गंभीर गाली को विशेष रूप से तारांकित किया जाए और सबसे ऊपर वीआईपी गाली को को विशेषाधिकार समिति के पास भेजा जाए। इसी तरह सोशल मीडिया पर भी गाली को कानूनी मान्यता दी जाए। किसी पोस्ट को गाली देने से पहले यूजर को एक बॉक्स पर टिक करना चाहिए और कहना चाहिए कि वह स्वेच्छा से गाली दे रहा है और इसके परिणामों के लिए वह स्वयं जिम्मेदार होगा। इसके बाद उसे गाली देने की अनुमति मिले। इससे डिजिटल गाली में गाली सेक्टर में पारदर्शिता आएगी।

भारतीय संस्कृति के कुछ तथाकथित लोग गाली का विरोध कर सकते हैं। वे कह सकते हैं कि गाली को कानूनी मान्यता देने से समाज में अश्लीलता बढ़ेगी। ऐसे लोगों का ब्रेनवाश करने की जरूरत है। भई, जो चीज पहले से समाज में मौजूद है, उसे कानून के दायरे में लाने में बुराई ही क्या है? आखिर चोरी, रिश्वत और भ्रष्टाचार के बारे में भी कानून हैं। फिर भी वे खत्म नहीं हुए। तो गाली का कानून बनने से गाली के खत्म होने का कोई खतरा नहीं। बल्कि कानून बनने के बाद गाली और मजबूत होगी। गाली देने वाला निश्चिंत होकर कह सकेगा, “मैं कानून के तहत गाली दे रहा हूं।” इसी तरह गाली खाने वाला भी गर्व से कह सकेगा, “मुझे कानूनी द्वारा मंजूर की गई गाली दी गई।” तो आइए मिलकर गाली को वैधानिक दर्जा देने की मुहिम शुरू करें।

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व्यंग्य – गाली खाने का सुख!

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हरिगोविंद विश्वकर्मा
आपने कभी गाली खाई है। नहीं न… तब निश्चित रूप से आप गाली खाने के सुख से वंचित हैं। पहले किसी को कोई गाली दे देता था, तो बवाल हो जाता था। कहने का मतलब गाली खाना अपमान माना जाता था। गाली खाने वाले व्यक्ति का चेहरा उतर जाता था। वह रूंआसा हो जाता था। उसे लगता था उसकी इज्जत चली गई। इसीलिए कई बार लोग गाली के बदले गाली देते थे। लेकिन अब समय बदल गया है। अब गाली खाने से इज्जत नहीं जाती। अब तो गाली खाना उपलब्धि हो गई है। पब्लिक लाइफ में तो गाली खाने वाला व्यक्ति गर्व से कहता है, देखा, मुझे लोग गालियां दे रहे हैं। अब आप मेरी लोकप्रियता का अंदाजा लगा सकते हैं।

गाली देने वाला कम गाली खाने वाला ज्यादा चर्चा में आता है। जिसे कोई गाली नहीं देता, उसे कोई जानता भी नही। आजकल अच्छा काम करने से लोकप्रियता नहीं मिलती। गाली खाने से लोकप्रियता मिलती है। आप लाख ईमानदार हैं, अगर आपको गाली नहीं मिली तो आपकी ईमानदारी व्यर्थ है, क्योंकि आप गाली खाने के सुख से वंचित हैं। सोशल मीडिया पर जिसे लोग ज्यादा गाली देते हैं, उसका अकाउंट जल्दी मोनेटाइज होता है। गाली अपने साथ लोकप्रियता के साथ-साथ लक्ष्मी को भी लेकर आती है।

पहले गाली खाने के लिए गाली देने वाले के सामने जाना पड़ता था। अब लोग घर बैठे गाली खाते हैं। यह सोशल मीडिया का कमाल है। इस माध्यम ने गाली खाने को आसान बना दिया है। आप बस मोबाइल उठाइए। कोई वीडियो बनाकर डाल दीजिए। थोड़ी ही देर में आपकी झोली में गालियां गिरनी शुरू हो जाएंगी। आप आराम से स्क्रीन पर तरह-तरह की गालियों का आनंद लीजिए।

गाली खाने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि चमड़ी मोटी हो जाती है। जैसे-जैसे चमड़ी मोटी होती जाती है। वैसे-वैसे कॉन्फिडेंस बढ़ता है। एक समय ऐसा आता है कि गालियां टॉफी की तरह लगने लगती हैं। अगर टॉफियां मुंह में मिठास बढ़ाती हैं तो गालियां व्यक्तित्व में आत्मविश्वास डाल देती हैं। दरअसल पहले आलोचना होती थी। अब गाली है। आलोचना का जवाब देना पड़ता था, लेकिन गालियों का कोई जवाब देने की जरूरत नहीं होती। यानी गालियां गाली खाने वाले को जवाबदेही से बचा लेती हैं।

अब तो गाली खाने का सुख ज्यादा लोग टेस्ट कर चुके हैं। कुछ लोग तो गाली खाने में गजब के निपुण हैं। उन्हें गाली न मिले तो बेचैनी होने लगती है। सोचते हैं कि अब गाली क्यों नहीं मिल रही है? कहीं लोकप्रियता कम तो नहीं हो रही? ऐसे लोग सुबह उठकर सबसे पहले सोशल मीडिया देखते हैं। गालियों की संख्या कम होने पर चिंतित हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि जनता उदासीन हो गई है। जनता की उदासीनता तो गाली से भी ज्यादा खतरनाक है। इसलिए जनता कभी उदासीन नहीं होनी चाहिए। तो जनता को गाली देने के लिए उकसाते रहना चाहिए।

इसलिए अगर आपको जीवन में आगे बढ़ना है, तो गाली खाने का अभ्यास शुरू कर दीजिए। पहले एक-दो गालियों से शुरुआत करें। फिर पांच गालियां। तदुपरांत दस गालियां। उसके बाद बीस गालियां। पचास गालियां और फिर गालियों का शतक! जिस दिन आपने गालियां खाने का शतक बनाया, उसे दिन आप सीजन्ड व्यक्ति हो जाएंगे। आपको किसी से डर ही नहीं लगेगा, क्योंकि ज़्यादा से ज्यादा आदमी क्या कर सकता है? जाहिर है वह गाली दे सकता है, लेकिन गाली तो आपके लिए मलाई-बरफी की तरह है। आराम से डाइजेस्ट कर लेंगे।

हां, गाली खाने के बाद वीडियो बनाइए और जनता को बताइए कि आपको गाली दी जा रही है। इस तरह आप गालियां खाने का सुख इन्जॉय कीजिए। हां, ध्यान रखिए, ऐसा कुछ करते रहिए ताकि लोग गाली देते रहें। हां, यह भी ध्यान रखें कि लोग आपको गाली देना बंद न करें। क्योंकि जिस दिन गालियां बंद हो गईं, उसी दिन आपकी लोकप्रियता भी खतरे में पड़ सकती है। इसलिए गाली खाते रहें, लोकप्रिय होते रहें और गाली खाने के सुख का आनंद लेते रहें।

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व्यंग्य – गाली विज्ञान का स्वर्णिम युग

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हरिगोविंद विश्वकर्मा
विज्ञान ने मानवता को बहुत कुछ दिया है। मसलन- पहिया, इंजन, बिजली, इंटरनेट और आजकल एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस। लेकिन भारत ने विज्ञान को एक दुर्लभ चीज दी है। वह दुर्लभ चीज है गाली। गाली विज्ञान अद्भुत विधा है। चूंकि गाली मनुष्य की योग्यता को ढंक देती है। इसलिए गाली मानव के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गई है। गाली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह तर्क की जगह ले लेती है। जिस व्यक्ति के पास तथ्य नहीं होते, उसके पास गालियां अवश्य होती हैं। इस तरह गाली अयोग्यता पर सबसे सुंदर पर्दा डाल देती है।

गाली में रहस्य होता है, गाली में रोमांच भी होता है और गुदगुदी भी। इसलिए गाली आमतौर पर सबको प्रिय है। भारत के लोग गर्व करते हैं कि गाली स्वदेशी खोज है। पहले गाली भावनाओं का अनियंत्रित विस्फोट होती थी। लोग किसी विषय पर बहस करते थे। बहस के दौरान तर्क देते थे। अब तर्क का स्थान गाली ने ले लिया। गाली विकसित सामाजिक कौशल बन गई है। समय बचाने के लिए लोग सीधे गाली दे देते है। गाली डिजिटल युग की सबसे बड़ी दक्षता है। समय बचता है और जो उद्देश्य भी हासिल हो जाता है। गाली देकर लोग संतुष्ट हो जाते हैं। मान लेते हैं कि उनका भावनाएं उस तक प्रेषित हो गईं जिसे गाली दी।

गाली का विकास मानव विकास के साथ ही हुआ था। कहने का तात्पर्य गाली विधा समाज में प्राचीनकाल से मौजूद रही है। लेकिन तब गाली लोग सार्वजनिक तौर पर नहीं देते थे। कह सकते हैं कि सभ्यता और शराफत ने गाली का गला घोंट दिया था। अब जैसे-जैसे मनुष्य सभ्यता जैसी आउटडेट चीज को टाटा-बाइ-बाइ कर रहा है। जैसे-जैसे वह शराफत का चोला उतार कर फेंक रहा है। वैसे-वैसे गाली के अच्छे दिन आ रहे हैं। पिछले एक दशक में तो गाली को सार्वजनिक मान्यता मिल गई है। कुछ लोग गाली देने और खाने की कला में निपुण हो जाते हैं। वे गर्व से बताते हैं, -देखा मुझे कितने लोग गाली दे रहे हैं। मुझे गालियां खाने की आदत पड़ गई।

कई लोग अपने बच्चों को गाली सिखाते हैं। गाली का अभ्यास करवाते हैं। आगे चलकर उनका बच्चा गालीबाज के रूप में नाम कमाता है। अब तो गाली का राजनीति से भी चोली-दामन का संबंध हो गया। हर राजनीतिक पार्टी में गाली प्रकोष्ठ बना दिया गया है। कई गाली-प्रवक्ता भी है। जो खुलेआम गाली देते थे। इधर सोशल मीडिया ने लाखों गालीबाज पैदा कर दिए। इन्हें गाली वैज्ञानिक कहा जा सकता है। ये लोग बिना विषय जाने भी गाली देते हैं। कई लोग गाली देने में पीएचडी जैसा आत्मविश्वास रखते हैं। गाली विद्वता की कमी को ढंक देती है। जितनी कम जानकारी, उतना अधिक गाली और आत्मविश्वास।

आज के दौर में आदमी की महानता उसकी उपलब्धियों से नहीं है। उसकी महानता इस बात से है कि वह एक दिन में कितनी गालियां खाता है। गाली खाने के बाद भी अगले दिन उसी मुस्कान के साथ कैमरे के सामने आता है। गाली एक कला है। गाली देना उससे भी बड़ी कला है और गाली खाना सबसे बड़ी कला है। पहले लोग सम्मान कमाने की कोशिश करते थे। आजकल लोग गालियां कमाते हैं। जिस दिन किसी की पोस्ट पर हजार गालियां आ जाएं, समझिए समाज ने उस व्यक्ति को लोगों ने स्वीकार कर लिया है। दरअसल, जिस देश में तर्क हार जाए और गाली जीत जाए, वहां गाली केवल भाषा नहीं रहती, वह विज्ञान बन जाती है। और जब किसी विज्ञान का स्वर्णिम युग आता है, तो प्रयोगशालाओं में नहीं, टीवी स्टूडियो, सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर उसके सबसे सफल प्रयोग दिखाई देते हैं। शोधपत्र कम छपते हैं, गालियां ज्यादा प्रकाशित होती हैं। यही गाली विज्ञान का स्वर्णिम युग है।

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व्यंग्य – चोरी में आत्मनिर्भर देश

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हरिगोविंद विश्वकर्मा
एक देश है, बहुत तेज़ी से तरक्की कर रहा है। पिछले पिचहत्तर साल के दौरान केवल और केवल तरक्की ही हुई है। जैसा कि होता है, तरक्की जब ज्यादा हो जाती है। यानी और तरक्की की गंजाइश नहीं रह जाती है। तब मान लिया जाता है कि देश आत्मनिर्भर हो गया। पिछले कुछ दशक में देश में हत्या, अपहरण आदि में अच्छा काम हुआ। लेकिन बेचारी चोरी पिछड़ गई थी। कई लोग चोरी कर-करके इसे प्रगति की राह पर लाना चाहते थे, लेकिन चोरी थी कि कछुआ चाल चल रही थी। लेकिन अब चोरी खरगोश की तरह भार रही है। देश में धड़ल्ले से चोरी हो रही है। चोरी ने बहुत तरक्की कर ली है। इसलिए कहा जा सकता है कि देश ने चोरी में आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है।

एक समय था जब चोरी का स्तर बहुत साधारण हुआ करता था। कोई रात के अंधेरे में सेंध लगाकर दो पीतल के लोटे चुरा लेता था। कोई साइकिल चुरा लेता था। चोरों में भी संकोच बचा हुआ था। वे चोरी करके भागते थे। उन्हें पकड़े जाने का डर रहता था। लेकिन समय बदल चुका है। चोरी ने देश के साथ कंधे से कंधा मिलाकर विकास किया है। एक तरह से चोरी ने आधुनिकता को गले लगा लिया है। अब चोरी भी आत्मविश्वास के साथ होती है। कई बार तो चोरी इतनी खुलेआम होती है कि चोर को भागने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती।

कई चोर विशेषज्ञों का मानना है कि चोरी अब स्टार्टअप मॉडल पर काम कर रही है। इसमें रिसर्च, इनोवेशन और स्किल डेवलपमेंट का समावेश हो चुका है। पहले चोरी व्यक्तिगत प्रतिभा थी, अब यह संगठित उद्योग बन चुकी है। यही किसी भी आत्मनिर्भर राष्ट्र की पहचान होती है। पहले केवल जेबें कटती थीं, लेकिन आजकल अवसर काट लिए जाते हैं। पहले घरों के ताले टूटते थे। आजकल विश्वास टूटता है। पहले तिजोरियाँ खाली होती थीं। आजकल लोगों की उम्मीदें खाली हो जाती हैं। यही तो सर्वांगीण विकास है।

आजकल चोरी करना सम्मान की बात हो गई है। सरकार को चोरी को औपचारिक मान्यता देने पर विचार करना चाहिए। “राष्ट्रीय चोरी प्रोत्साहन परिषद” बनाई जा सकती है। योग्य चोरों को प्रशिक्षण दिया जाए। नए युवाओं के लिए स्किल प्रोजेक्ट के तहत “एडवांस्ड चोरी मैनेजमेंट” का डिप्लोमा शुरू किया जा सकता है। सिलेबस में “सीसीटीवी देखकर भी न घबराना”, “पकड़े जाने पर आत्मविश्वास से मुस्कुराना” और “गलती स्वीकार न करने की कला” जैसे विषय शामिल किए जा सकते हैं। उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वालों को “चोर रत्न पुरस्कार” से सम्मानित किया जा सकता है।

कई चोर इतिहासकार बताते हैं, कभी चोरी को बुरा काम माना जाता था। लोग चोरी करने के बाद चेहरा छिपाते थे। आजकल यह हीनभावना समाप्त हो चुकी है। यही सामाजिक प्रगति का प्रतीक है। अब कई लोग आत्मविश्वास से चोरी करते हैं। इतने आत्मविश्वास से कि यदि उन पर उँगली उठाई जाए तो वे उल्टा पूछ बैठते हैं, “सबूत कहाँ है?” यह चोरी में आत्मनिर्भरता की पराकाष्ठा है।

जैसा कि बताया जा चुका है, पहले पैसे चुराते थे। फिर साइकिल, फिर भूमि चोरी हुई। पिछले कुछ दशक से विचार चुराए जाने लगे हैं। आजकल तो लोग श्रेय चुरा लेते हैं। अब देश में जनादेश और बच्चों का भविष्य चुराने की स्पर्धा है। लेटेस्ट डवलपमेंट यह है कि अब शर्म और ईमानदारी भी चोरी होने लगी है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी चोरी ने विकास की नई ऊंचाइयां छू ली हैं। अब पूरी की पूरी योजनाएँ, विचार और उपलब्धियाँ चोरी कर लेते हैं। शहरों में तो प्रतिस्पर्धा और भी तीव्र है। इसे आधुनिक अर्थव्यवस्था की साझेदारी कहा जाता है। अगर देश की बात करें तो चोरी सेक्टर ने विकास के नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं।

हालांकि कुछ लोग अब भी पुराने विचारों में अटके हुए हैं। वे कहते हैं कि चोरी रुकनी चाहिए। ऐसे लोग विकास की गति नहीं समझते हैं। यदि चोरी रुक गई तो “चोरी में आत्मनिर्भरता’ का सपना अधूरा रह जाएगा। इसलिए समय की मांग है कि हम चोरी सेक्टर की उपलब्धियों का सम्मान करें। जिस देश ने हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने का संकल्प लिया है, वह चोरी में पीछे क्यों रहे?

अब गर्व से कह सकते हैं कि चोरी के लिए किसी विदेशी तकनीक, विदेशी चोर या विदेशी सलाह की आवश्यकता नहीं है। इस क्षेत्र में ऐसी स्वदेशी क्षमता विकसित कर ली है कि दुनिया चाहे तो यहां से प्रशिक्षण ले सकती है। आखिर आत्मनिर्भर देश का अर्थ ही यही है कि जो काम करना हो, उसे अपने दम पर किया जाए, चाहे वह काम चोरी ही क्यों न हो!

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आरक्षण केवल संविधान में नहीं, समाज की संरचना में भी मौजूद है

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जो लोग आरक्षण का विरोध करते हैं, क्या वे हर तरह के आरक्षण का विरोध करते हैं?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
इंसान जब पैदा होता है, तब वह न जाति जानता है, न धर्म, न ऊँच-नीच और न ही आरक्षण। वह सिर्फ़ और सिर्फ़ एक अबोध शिशु होता है। लिहाज़ा, उसके पास न कोई विचारधारा होती है, न कोई पूर्वाग्रह और न ही समाज को देखने का कोई निश्चित दृष्टिकोण। इसीलिए बच्चा मासूमस होता है, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, भाषा या अंचल का हो।

लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, उसकी उम्र बढ़ती है। परिवार, समाज और परिवेश उसके भीतर धारणाएँ भरने लगते हैं। शिक्षा उसे ज्ञान देती है। अर्जित अनुभव उसे परिपक्व बनाता है और ज़िम्मेदार पद उसे व्यापक दृष्टि अपनाने की प्रेरणा देते हैं। इसलिए स्वाभाविक अपेक्षा यह होती है कि जितना बड़ा व्यक्ति होगा, उतनी ही व्यापक उसकी सोच होगी। स्वाभाविक रूप से उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे किसी भी सामाजिक प्रश्न को केवल व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर नहीं, बल्कि उसके ऐतिहासिक, सामाजिक और मानवीय संदर्भों में भी समझेंगे।

लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हमेशा नहीं होता है। उम्र बढ़ने, वह अनुभव अर्जित करने, शिक्षा प्राप्त करने, जीवन के उतार-चढ़ाव देखने और समाज तथा प्रशासन के महत्वपूर्ण पदों तक भी पहुँचने के बावजूद बौद्धिक रूप से अपरिपक्व रह जाते हैं। हमारे समाज में ऐसे अनेक अत्यधिक शिक्षित, प्रतिष्ठित और प्रभावशाली लोग हैं, जो आरक्षण का नाम सुनते ही भड़क उठते हैं। उनका पहला वाक्य होता है- “आरक्षण प्रतिभा के साथ अन्याय है। आरक्षण के कारण देश से प्रतिभा का पलायन हो रहा है।”

यह सुनकर लगता है कि मानो वे प्रतिभा के सबसे बड़े संरक्षक हैं और प्रतिभा यानी टैलेंट क्या है, यह बहुत अच्छी तरह से समझते हैं। लेकिन जब उनके तर्कों को थोड़ा गहराई से परखा जाता है, तो पता चलता है कि वे केवल संविधान में दिए गए आरक्षण को देखते हैं, उनकी संकुचित निगाह भारतीय समाज में सदियों से चले आ रहे आरक्षण को नहीं देख पा रही है।

ज़रा सोचिए। यदि किसी बच्चे का जन्म ऐसे परिवार में होता है जहां पीढ़ियों से शिक्षा है, आर्थिक संपन्नता है, सामाजिक प्रतिष्ठा है, प्रभावशाली लोगों से संपर्क हैं, अच्छी अंग्रेज़ी माध्यम की शिक्षा है, महँगी कोचिंग की सुविधा है, घर में पढ़ने का शांत वातावरण है और असफल होने पर भी संभाल लेने वाली आर्थिक सुरक्षा है, तो क्या वह उसी शुरुआती रेखा से दौड़ शुरू कर रहा है जहाँ वह बच्चा खड़ा है, जिसके माता-पिता अशिक्षित हैं, घर में पढ़ने की जगह नहीं है, रोज़गार की चिंता पढ़ाई से बड़ी है और जिसकी पहली लड़ाई ही पेट भरने की है?

यदि उत्तर ‘नहीं’ है, तो फिर केवल अंतिम अंक देखकर यह कैसे तय किया जा सकता है कि कौन अधिक प्रतिभाशाली है? सवाल यह नहीं है कि किसके अंक अधिक हैं। सवाल यह है कि उन अंकों तक पहुंचने का रास्ता किसके लिए कितना कठिन था।

हम अक्सर सफलता को व्यक्तिगत प्रतिभा का परिणाम मान लेते हैं। लेकिन सफलता केवल प्रतिभा का परिणाम नहीं होती। वह अवसर, संसाधन, वातावरण, मार्गदर्शन, सामाजिक स्वीकृति और आर्थिक सुरक्षा का भी परिणाम होती है। यदि ऐसा नहीं होता, तो देश के हर गांव और हर झुग्गी से आईएएस, वैज्ञानिक, न्यायाधीश और उद्योगपति बराबर संख्या में निकल रहे होते।

यही वह सच्चाई है, जिसे आरक्षण का विरोध करने वाले अक्सर स्वीकार नहीं करना चाहते हैं। डॉ. बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर ने आरक्षण किसी पर कृपा करने के लिए नहीं बनाया था। उन्होंने समाज में उसे उस ऐतिहासिक असंतुलन को कम करने का संवैधानिक माध्यम बनाया, जिसने सदियों तक करोड़ों लोगों को शिक्षा, सम्मान, संपत्ति और अवसरों से दूर रखा। जिन्होंने इतिहास में कभी बराबरी की शुरुआत ही नहीं की, उनसे आज यह कहना कि “अब सब बराबर दौड़ो”, न्याय नहीं, बल्कि अन्याय है।

विडंबना देखिए कि जो लोग संवैधानिक आरक्षण पर सबसे अधिक आक्रामक होते हैं, वे सामाजिक आरक्षण पर शायद ही कभी बोलते हैं।

  • क्या जन्म के आधार पर कुछ जातियों को केवल ज्ञान प्राप्त करने का अधिकार और कुछ को केवल सेवा करने का दायित्व सौंप देना आरक्षण नहीं था?
  • क्या कुछ लोगों को मंदिरों में प्रवेश देना और कुछ को बाहर खड़ा रखना आरक्षण नहीं था?
  • क्या कुछ परिवारों के लिए प्रशासन, व्यापार, शिक्षा और सामाजिक नेतृत्व के रास्ते खुले रखना और दूसरों के लिए उन्हें लगभग बंद कर देना आरक्षण नहीं था?

यदि यह सब आरक्षण नहीं था, तो फिर था क्या? सच्चाई यह है कि भारत में आरक्षण की शुरुआत संविधान से नहीं हुई थी। संविधान ने तो केवल उस असमान व्यवस्था को कुछ हद तक संतुलित करने का प्रयास किया, जो पहले से मौजूद थी।

आरक्षण का विरोध करने वालों से एक और प्रश्न पूछा जाना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति की सफलता में उसके सरनेम, उसके परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा, उसके पिता की पहचान, उसके रिश्तों का नेटवर्क, उसके आर्थिक संसाधन और उसके सामाजिक प्रभाव का योगदान है, तो क्या वह पूरी तरह व्यक्तिगत प्रतिभा की सफलता है?

यदि किसी का सरनेम ही उसके लिए दरवाज़े खोल देता है, यदि किसी के पिता का परिचय उसे अवसर दिला देता है, यदि किसी का सामाजिक दायरा उसकी राह आसान कर देता है, तो यह भी तो जन्म से मिला विशेषाधिकार है। अंतर केवल इतना है कि इस आरक्षण का उल्लेख संविधान में नहीं है।

हम अक्सर कहते हैं कि चयन केवल मेरिट के आधार पर होना चाहिए। लेकिन मेरिट क्या है? क्या केवल परीक्षा में प्राप्त अंक ही मेरिट हैं? यदि दो विद्यार्थी एक ही परीक्षा देते हैं, लेकिन एक के पास वर्षों की महंगी कोचिंग, आधुनिक तकनीक, निजी शिक्षक और आर्थिक सुरक्षा थी, जबकि दूसरे ने अभावों के बीच सरकारी स्कूल में पढ़कर वही परीक्षा दी, तो दोनों के अंकों की तुलना करना आसान है, लेकिन क्या यह न्यायपूर्ण भी है?

दरअसल, मेरिट केवल परिणाम नहीं होती, बल्कि उस परिणाम तक पहुँचने की परिस्थितियाँ भी उसका हिस्सा होती हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि हर संपन्न व्यक्ति अयोग्य है या हर वंचित व्यक्ति प्रतिभाशाली। यह भी उतना ही गलत निष्कर्ष होगा। प्रतिभा किसी जाति, वर्ग या धर्म की बपौती नहीं है। वह हर घर में जन्म लेती है। फर्क केवल इतना है कि हर प्रतिभा को फलने-फूलने के लिए समान अवसर नहीं मिलते।

यही कारण है कि आरक्षण की बहस को “प्रतिभा बनाम आरक्षण” तक सीमित कर देना बौद्धिक ईमानदारी नहीं है। वास्तविक बहस “समान अवसर बनाम असमान अवसर” की है। जिस दिन भारत का हर बच्चा एक जैसी शिक्षा पाएगा, एक जैसा सामाजिक सम्मान पाएगा, एक जैसी आर्थिक सुरक्षा पाएगा, एक जैसी प्रतिस्पर्धा का वातावरण पाएगा और उसकी सफलता का निर्धारण केवल उसकी मेहनत और उसकी क्षमता से होगा, उस दिन सबसे पहले आरक्षण की आवश्यकता समाप्त करने की बात की जानी चाहिए।

लेकिन जब तक कुछ लोगों को जन्म लेते ही अवसरों का महल मिल जाता है और कुछ को संघर्ष का रेगिस्तान, तब तक केवल संवैधानिक आरक्षण पर प्रश्न उठाना और सामाजिक विशेषाधिकारों पर मौन रहना न्याय नहीं, बल्कि चयनात्मक नैतिकता है।

यदि वास्तव में आरक्षण का विरोध करना है, तो हर प्रकार के आरक्षण का विरोध कीजिए- संवैधानिक भी और सामाजिक भी। लेकिन यदि विरोध केवल उस आरक्षण से है, जो सदियों से वंचित लोगों को आगे बढ़ने का अवसर देता है, और समर्थन उस अदृश्य आरक्षण का है, जो जन्म के साथ विशेषाधिकार बांटता है, तो फिर यह प्रतिभा की लड़ाई नहीं, विशेषाधिकारों की रक्षा की लड़ाई है।

जिस दिन भारत का हर बच्चा समान गुणवत्ता वाली शिक्षा पाएगा, समान सामाजिक सम्मान के साथ बड़ा होगा, समान आर्थिक अवसरों तक पहुंचेगा और उसकी सफलता या असफलता का निर्धारण केवल उसकी मेहनत और क्षमता से होगा, उस दिन आरक्षण की आवश्यकता पर स्वाभाविक रूप से पुनर्विचार किया जा सकेगा। लेकिन जब तक जन्म ही किसी व्यक्ति की संभावनाओं, अवसरों और सामाजिक स्थिति का सबसे बड़ा निर्धारक बना रहेगा, तब तक केवल संवैधानिक आरक्षण को अन्याय कहना और सामाजिक विशेषाधिकारों को अनदेखा करना न्यायपूर्ण दृष्टिकोण नहीं कहा जा सकता।

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