हरिगोविंद विश्वकर्मा
भारतीय समाज में स्त्री को बहुत ऊंचा स्थान दिया गया है। उसे देवी कहा जाता है। शक्ति और ममता की मूर्ति कहा जाता है। लेकिन कभी-कभी ऐसा लगता है कि स्त्री को इतना ऊंचा स्थान देने के पीछे कहीं उसे इंसान मानने से बचने की कोशिश तो नहीं है? देवी आदर्श स्त्री है। गलतियां नहीं करती। देवी न तो कभी थकती है और न ही कभी शिकायत करती है। देवी अपने लिए कुछ नहीं मांगती, जो कुछ मांगती है या करती है, वह सब दूसरों के लिए। देवी सब कुछ सहती है और शायद इसी वजह से स्त्री से भी हमेशा आदर्श होने की उम्मीद की जाती है।
बेटी के रूप में स्त्री से उम्मीद की जाती है कि वह संस्कारी हो। बहू के रूप में स्त्री से उम्मीद होती है कि वह पूरे परिवार को साथ लेकर चले। पत्नी के रूप में स्त्री से कहा जाता है कि वह पति का साथ हर परिस्थिति में दे। मां के रूप में स्त्री से अपेक्षा होती है कि वह बच्चों के लिए अपनी हर इच्छा त्याग दे। इसी तरह नौकरी करने वाली स्त्री से उम्मीद की जाती है कि काम पूरी निष्ठा से करे और घर भी कुशलता से संभाले। लेकिन पुरुष के लिए आदर्श भूमिकाओं वाली सूची है ही नहीं।
एक पुरुष देर से घर आए तो कहा जाता है, ‘काम में व्यस्त होगा।’ वही काम अगर स्त्री को देर तक रोक ले तो सवाल उठने लगते हैं। पुरुष करियर के लिए दूसरे शहर जाए तो उचित माना जाता है, लेकिन महिला ऐसा करे तो उस पर परिवार की अनदेखी के आरोप लगते हैं। पुरुष दोस्तों के साथ समय बिताए तो सामान्य है, लेकिन महिला अपने लिए समय निकाले तो लापरवाह कहलाती है। उसे अपने दायित्वों की याद दिलाया जाता है। यह दोहरा मापदंड केवल बाहर नहीं है। कई बार यह घर की चारदीवारी में ही पैदा होता है।
बेटी से बचपन से ही कहा जाता है, ‘बेटी, तुम्हें तो ससुराल जाना है, थोड़ा समझौता करना सीखो।’ परंतु बेटे से नहीं कहा जाता, ‘बेटे, तुम्हें भी किसी का पति बनना है, समझौते करना सीखो।’ बेटी को बचपन से गृह कार्य सिखाए जाते हैं क्योंकि ‘आगे काम आएंगे।’ बेटे को क्यों नहीं सिखाया जाता कि घर चलाना भी जीवन का जरूरी कौशल है? आखिर स्त्री से इतने त्याग की अपेक्षा करना इतना सहज क्यों है? समाज ने त्याग को स्त्री का गुण बना दिया है और अधिकार को उसका प्रश्न। समाज सहनशीलता को स्त्री की खूबी मानता है। प्रतिरोध को स्त्री की कमी। वह चुप रहे तो संस्कारी है। वह सवाल करे तो जिद्दी है। वह सब सह ले तो अच्छी स्त्री है। अपने सम्मान के लिए खड़ी हो जाए तो स्वार्थी स्त्री।
स्त्री भी इंसान है। वह भी थक सकती है। उसे भी गुस्सा आ सकता है। उसे भी अपने लिए समय चाहिए। वह भी गलती कर सकती है। उसे भी कभी-कभी परिवार से अलग अपनी दुनिया चाहिए। उसके भी सपने हो सकते हैं जो पत्नी, मां या बहू बनने से अलग हों। इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है। दरअसल, मूल समस्या यह है कि समाज ने स्त्री को इंसान से पहले उसकी भूमिका में देखना शुरू कर दिया है। वह मां है, तो उसे त्याग करना चाहिए। वह पत्नी है, तो उसे समझौता करना चाहिए। वह बहू है, तो उसे सबको खुश रखना चाहिए। वह बेटी है, तो उसे परिवार की इज्जत का ध्यान रखना चाहिए। लेकिन वह स्वयं भी एक व्यक्ति है, यह बात समाज अक्सर भूल जाता है।
स्त्री को आदर्श बनाने की कोशिश में हमने उसके वास्तविक संघर्षों को छोटा कर दिया। मां बच्चे पर कभी नाराज हो जाए तो उसे अपराधबोध होता है। पत्नी पति से असहमति जताए तो उसे लगता है कि शायद वह अच्छी पत्नी नहीं है। बेटी माता-पिता की किसी बात से असहमत हो जाए तो उसे डर रहता है कि कहीं उसे स्वार्थी न समझ लिया जाए। आखिर क्यों? क्या पुरुष को हर रिश्ते में आदर्श होने की ऐसी परीक्षा देनी पड़ती है? इसका अर्थ यह नहीं कि पुरुष जिम्मेदार नहीं हैं, या स्त्रियां हमेशा सही हैं। दोनों मनुष्य हैं, इसलिए दोनों से गलतियां होंगी। दोनों को अपने रिश्तों के प्रति जिम्मेदार होना चाहिए। लेकिन जिम्मेदारी और आदर्शवाद में फर्क है। इंसान से जिम्मेदारी अपेक्षित हो सकती है, पर पूर्णता की मांग किसी इंसान से नहीं की जा सकती। स्त्री को देवी बनाने की जरूरत नहीं है। उसे बराबरी का इंसान मानने की जरूरत है।
स्त्री को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वह कहे, ‘आज मैं थकी हूं। आज मुझे मदद चाहिए। आज मैं असहमत हूं। आज मैं अपने लिए कुछ करना चाहती हूं।’ और कभी-कभी वह यह भी कह सके, ‘मैं गलत थी।’ गलती करने का अधिकार भी इंसान होने का हिस्सा है। बेटियों को केवल आदर्श बनने की सीख न दी जाए। उन्हें स्वतंत्र सोचने, निर्णय लेने और अपनी सीमाएं तय करने की सीख दी जाए। बेटों को भी यह सिखाएं कि घर और रिश्ते केवल महिलाओं की जिम्मेदारी नहीं हैं। तो अगली बार जब किसी स्त्री से कहें, ‘तुम तो स्त्री हो, तुम्हें तो समझना चाहिए’, तो एक पल रुककर खुद से भी पूछें, ‘क्या समझना, सहना और त्याग करना केवल स्त्री का ही कर्तव्य है?’ अब समय आ गया है कि स्त्री से आदर्शवाद की उम्मीद करने के बजाय उससे वही ईमानदारी, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की उम्मीद की जाए जो हर इंसान से की जाती है। उसे भी इंसान की तरह जीने दिया जाए। देवी बनने का बोझ उस पर न लादा जाए। उसे बस एक स्त्री रहने दिया जाए।
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